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रविवार, 9 जून 2024

श्री माधवराव गोलवलकर ( गुरुजी )

 *******श्री गुरु जी *******

                  (5 जून,1973/ पुण्य-तिथि)

                  संघ के संस्थापक परम् पूजनीय डा. हेडगेवार जी ने अपने देहान्त से पूर्व जिनके समर्थ कन्धों पर संघ का भार सौंपा, वे थे श्री माधवराव गोलवलकर, जिन्हें सब प्रेम से श्री गुरुजी कहकर पुकारते हैं। आज उनकी 48 वीं पुण्य-तिथि है|

                  श्रीगुरुजी का जन्म 19 फरवरी, 1906 (विजया एकादशी) को नागपुर में अपने मामा के घर हुआ था। उनके पिता श्री सदाशिव गोलवलकर उन दिनों नागपुर से 70 कि.मी. दूर रामटेक में अध्यापक थे।

                    माधव बचपन से ही अत्यधिक मेधावी छात्र थे। उन्होंने सभी परीक्षाएँ सदा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। कक्षा में हर प्रश्न का उत्तर वे सबसे पहले दे देते थे। अतः उन पर यह प्रतिबन्ध लगा दिया गया कि जब कोई अन्य छात्र उत्तर नहीं दे पायेगा, तब ही वह बोलेंगे |

                  उच्च शिक्षा के लिए काशी जाने पर उनका सम्पर्क संघ से हुआ। वे नियमित रूप से शाखा पर जाने लगे। जब डा. हेडगेवार जी काशी आये, तो उनसे वार्तालाप में माधव का संघ के प्रति विश्वास और दृढ़ हो गया। एम-एस.सी. करने के बाद वे शोधकार्य के लिए मद्रास गये; पर वहाँ का मौसम अनुकूल न आने के कारण वे काशी विश्वविद्यालय में ही प्राध्यापक बन गये। 

                   उनके मधुर व्यवहार तथा पढ़ाने की अद्भुत शैली के कारण सब उन्हें ‘गुरुजी’ कहने लगे और फिर तो यही नाम उनकी पहचान बन गया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक मालवीय जी भी उनसे बहुत प्रेम करते थे। कुछ समय काशी रहकर वे नागपुर आ गये और कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन दिनों उनका सम्पर्क रामकृष्ण मिशन से भी हुआ और वे एक दिन चुपचाप बंगाल के सारगाछी आश्रम चले गये। वहाँ उन्होंने विवेकानन्द के गुरुभाई स्वामी अखंडानन्द जी से दीक्षा ली। 

                  स्वामी जी के देहान्त के बाद वे नागपुर लौट आये तथा फिर पूरी शक्ति से संघ कार्य में लग गये। उनकी योग्यता देखकर डा. हेडगेवार जी ने उन्हें 1939 में सरकार्यवाह का दायित्व दिया। अब पूरे देश में उनका प्रवास होने लगा। 21 जून, 1940 को डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद श्री गुरुजी सरसंघचालक बने। उन्होंने संघ कार्य को गति देने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। 

                     1947 में देश आजाद हुआ; पर उसे विभाजन का दंश भी झेलना पड़ा। 1948 में गांधी जी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। श्री गुरुजी को जेल में डाल दिया गया; पर उन्होंने धैर्य से सब समस्याओं को झेला और संघ तथा देश को सही दिशा दी। इससे सब ओर उनकी ख्याति फैल गयी। संघ-कार्य भी देश के हर जिले में पहुँच गया।

                  श्री गुरुजी का धर्मग्रन्थों एवं हिन्दू दर्शन पर इतना अधिकार था कि एक बार शंकराचार्य पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया गया था; पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार कर दिया। 1970 में वे कैंसर से पीड़ित हो गये। शल्य चिकित्सा से कुछ लाभ तो हुआ; पर पूरी तरह नहीं। इसके बाद भी वे प्रवास करते रहे; पर शरीर का अपना कुछ धर्म होता है। उसे निभाते हुए श्री गुरुजी ने 5 जून,1973 को रात्रि में शरीर छोड़ दिया।

                  श्रीगुरुजी, अपनी विचार शक्ति व कार्यशक्ति से विभिन्न क्षेत्रों एवम् संघटनाओं के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत बनें। श्रीगुरुजी का जीवन अलौकिक था, राष्ट्रजीवन के विभिन्न पहलुओं पर उन्होंने मूलभुत एवम् क्रियाशील मार्गदर्शन किया। “सचमुच ही श्रीगुरूजी का जीवन ऋषि-समान था।

सोमवार, 9 मार्च 2020

Swami Vivekananda biography - 1

Swami Vivekananda

स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता के सिमला क्षेत्र के प्रसिद्ध दत्त परिवार में हुआ था। उसके पिता श्री विश्वनाथ दत्त वकील थे। उन्होंने कई विषयों का अध्ययन किया था एवं सभी उनका समुचित सम्मान करते थे। उनकी पत्नी श्रीमती भुवनेश्वरी देवी थीं। वे दिखने एवं व्यवहार में एक रानी के समान गरिमामयी थीं। सभी उन्हें स्नेह एवं आदर करते थे।

12 जनवरी 1863 ई. को उन्होंने प्रथम पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम रखा गया - नरेन्द्रनाथ।

नरेन बड़ा नटखट बालक था, और कभी - कभी भुवनेश्वरी देवी उसे सम्भालने में असमर्थ हो जाती। परन्तु उन्होंने यह देखा कि जब नरेन्द्र अत्याधिक चंचल हो जाता, तो यदि उसके सिर पर ठण्डा पानी डालते हुए उसके कान में शिव का नाम सुनाया जाए, तो वह एकदम शान्त हो जाया करता । इसीलिए , अनेकों बार उसे नियन्त्रण में लाने के लिए वे इस युक्ति का इस्तेमाल किया करती थीं। 

बालक नरेन्द्र ने अपनी माता से बहुत - सी बातें सीखी थीं, और उनकी माता उसे महाभारत तथा रामायण से अनेकों कहानियाँ सुनाया करती थीं। नरेन्द्र को राम - विषयक कहानियाँ सुनना बहुत अच्छा लगता था। उसने राम - सीता की मिट्टी की एक युगल - मूर्ति खरीदी और फूलों से उसकी पूजा करनी शुरू कर दी । एक बार वह केले के उद्यान में इस उम्मीद में बहुत समय तक बैठा रहा कि उसे हनुमान जी के दर्शन प्राप्त होंगे क्योंकि उसने कहीं सुन रखा था कि राम के इस वीर भक्त को ऐसा स्थान अत्यन्त प्रिय है। उन्हें ध्यान में मग्न होनेवाला खेल भी प्रिय था। वह अपने दो - एक संगियों को अपने साथ किसी एकान्त स्थान में ले जाता और वे लोग सीता - राम या शिव की मूर्ति के सामने बैठ जाते । तब नरेन्द्र ध्यान करने बैठ जाता और भगवान का चिन्तन करता।

 वह ईश्वर के ध्यान में मग्न हो जाता और उस समय अपने आसपास कुछ भी अनुभव नहीं कर पाता। एक बार एक नाग सरकते हुए वहाँ आ पहुँचा । अन्य बालक भाग खड़े हुए, परन्तु नरेन्द्र वहीं बैठा रहा । उन्होंने बहुत बार उसे पुकारा , परन्तु नरेन्द्र ने कुछ न सुना। कुछ देर बाद नाग वहाँ से चला गया। बाद में जब उसके माता  - पिता ने नरेन्द्र से पूछा कि वह वहाँ क्यों नहीं , तो उसने कहा , ‘‘ मैं नाग के बारे में कुछ भी जान न पाया। मैं तो आनन्द में था।’’ 

जब कोई साधु नरेन्द्र के घर आते तो वह बड़ा प्रसन्न होता था। कभी- कभी तो वह उन्हें किमती चीजें तक दे डालता था। एक बार उसने अपना पहना हुआ नया कपड़ा ही एक साधु को दे दिया। इस घटना के बाद जब भी कोई साधु उनके घर में आता, तो नरेन्द्र को एक कमरे में बन्द कर दिया जाता था। परन्तु यदि नरेन्द्र उस समय किसी साधु को देख पाता तो खिड़की से ही चीजें फेंक दिया करता। कभी - कभी तो वह कह उठता कि किसी दिन वह भी साधु बन जाएगा।

जैसा हमने पहले ही कहा है, नरेन्द्र के पिताजी एक वकील थे । बहुत से लोग उनसे मिलने आया करते थे। वे उन सबका आतिथ्य करते एवं हुक्का पीने के लिए दिया करते । बैठकखाने में विभिन्न जाति के लोगों के लिए अलग - अलग हुक्कों की व्यवस्था थी। परन्तु जातिभेद नरेन्द्र के लिए एक बड़ा रहस्य था। क्यों एक जाति के सदस्य को अन्य जाति नरेन्द्र के लिए एक बड़ा रहस्य था। क्यों एक जाति के सदस्य को अन्य जाति के सदस्यों के साथ भोजन करने नहीं दिया जाता ? क्यों विभिन्न जातियों के लिए अलग - अलग हुक्कों की व्यवस्था की गई थी।

 क्या होगा यदि वह सभी हुक्कों से धुम्रपान करे? क्या कोई धमाका होगा? या छत नीचे गिर पड़ेगी? नरेन्द्र ने स्वयं ही इसका पता लगाने कि निश्चय किया। उसने एक हुक्के से एक कश लगाया। कुछ भी तो नहीं हुआ। इस प्रकार एक के बाद एक सभी हुक्कों से कश लगाया। फिर भी नहीं हुआ। उसी वक्त उसके पिताजी ने उस कक्ष में प्रवेश किया और पूछा कि वह क्या कर रहा है। नरेन ने उत्तर दिया , ‘‘ पिताजी मैं देख रहा था कि यदि मैंने इस तरह जाति तोड़ी, तो आखिर होगा क्या? ’’ उसके पिताजी ने एक ठहाका लगाया और अपने अध्ययन कक्ष में चले गए।
Swami Vivekananda biography

जब नरेन्द्र छह वर्ष का हुआ तो उसका पढ़ना शुरू हुआ पहले - पहल वह पाठशाला में नहीं गया था क्योंकि उसके पिताजी ने उसके लिए एक शिक्षक नियुक्त कर दिया था। जब सात वर्ष का हुआ तो उसे मेट्रोपोलिटन संस्था में दाखिल करवाया गया। इस संस्था के संस्थापक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर थे। नरेन्द्र नाथ एक अत्यन्त मेधावी छात्र था और अकस्मात् ही पाठ को याद कर लिया करता था। वह बालकों का नेता बन गया। खेल में उसकी बहुत रूचि थी। दोपहर भोजन समाप्त कर वह सबसे पहले खेल के मैदान में पहुँच जाता । कूदना , दौड़ना , मुक्केबाजी तथा काँच की गोलियों से खेलना आदि में उसकी विशेष रूचि थी। वह कुछ खेलों का आविष्कार भी कर लिया करता था। 

नरेन को पशुओं से भी बड़ी प्रीति थी तथा वह घर की गाय से भी खेला करता । उसने कुछ पालतू जानवर और पंक्षियों को भी पाल रखा था। इनमें एक - एक बन्दर , बकरी और मोर , कुछ कबूतर तथा दो या तीन गिनी - पिग थे। 
Swami Vivekananda

जैसे - जैसे नरेन्द्र बड़ा होने लगा वह खेलने के बजाय पुस्तकें पढ़ने में अधिक रूचि लेने लगा। एक वर्ष के लिए वह प्रेसिडेन्सी काॅलेज में पढ़ने  के लिए दाखिल हुआ, उसके दूसरे वर्ष वह जनरल असेम्बली की संस्था में दाखिल हुआ, जिसे आजकल स्काॅटिश चर्च काॅलेज कहा जाता है। इस काॅलेज के अध्यापकगण नरेन्द्र की बुद्धिमत्ता देखकर चमत्कृत हो जाते थे। प्रधानाध्यापक श्री विलियम हेस्टी ने कहा था कि नरेन के समान प्रतिभाशाली छात्र उन्होंने आज तक नहीं देखा । नरेन बहुत पढ़ाई करता था तथा विभिन्न विषयों पर अनेकों पुस्तकें पढ़ा करता था। उसने 1881 ई. में बी.ए. (प्रथम) की परीक्षा उत्तीर्ण कर 1884 ई. में बी.ए. की डिग्री प्राप्त की।

नरेन्द्र ने चार या पाँच वर्षों तक संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की थी। उसने अनेक प्रकार के वाद्य - यन्त्रों को बजाना भी सीख लिया था तथा एक उत्कृष्ट गायक के रूप में उसकी ख्याति भी हुई थी।

इसी समय नरेन धर्म - विषयक समस्याओं में विशेष रूचि लेने लगे। अन्य नवयुवकों की भाँति नरेन्द्र भी ब्रह्मसमाज का सदस्य बन गया तथा श्री केशवचन्द्र सेन की वकृताओं को सुनने लगा। परन्तु एक प्रश्न उसे सदा कष्ट पहुँचाता कि ईश्वर का कोई अस्तित्व भी है या नहीं अथवा क्या किसी ने आज तक उसे देखा भी है। इस प्रश्न के उचित समाधान हेतु वह अनेक धार्मिक नेताओं के समक्ष गया जिसमें श्री देवेन्द्रनाथ टैगोर भी थे। परन्तु कोई भी उसकी शंकाओं का समाधान नहीं कर सका।

माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक

madhavrao sadashivrao golavkar ji guruji
GURU JI

19 फरवरी सन् 1906 ई. में नागपुर में जन्मे श्री माधव सदाशिव गोलवलकर अपने माता पिता की नौ सन्तानों मे से एकमात्र जीवित पुत्र थे। ऐसा लगता है कि भाग्य ने ही एक विशेष उद्देश्य के लिए उन्हें जीवित रखा। तभी तो बाद के वर्षों में वे राष्ट्र के आशा - केन्द्र के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक बने।

बाल्यकाल से ही मेधावी रहे माधवराव नागपुर विश्वविद्यालय के हिस्लाॅप काॅलेज से स्नातक हुए । तत्पश्चात् उन्होंने वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.एससी. उत्तीर्ण की। उस अवधि में वे उस काल के प्रसिद्ध हिन्दू नेता और विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी के प्रेरणादायक व्यक्तित्व से प्रभावित हुए। बाद में दो वर्ष तक वे वहीं अध्यापक रहे। उनके प्रिया शिष्यगण आदर से उन्हें ‘‘ गुरूजी ’’ कहने लगे और यही उपनाम आगे भी उनसे जुड़ा रहा। जब वे अध्यापक थे तभी अपने एक छात्र श्री प्रभाकर बलवन्त ( भैयाजी ) दाणी की प्रेरणा से जो आगे चलकर संघ के कार्यवाह बने, वे संघ में प्रविष्ट हुए।

श्री गुरूजी सन् 1933 में नागपुर लौटे आये और यहां वे संघ के संस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार के चुम्बकीय व्यक्तित्व से आकर्षित हुए। इस संपर्क ने शीघ्र ही उनका ऐसा कायापलट किया, जैसे नरेन्द्र का श्री रामकृष्ण से मिलने पर हुआ था। अविवाहित जीवन व्यतीत करने का संकल्प लेकर उन्होने विधि का अध्ययन किया तथा कुछ समय तक वकालत की । परन्तु अधिकांश समय और शक्ति वे संघ की गतिविधियों में लगाने लगे।

किन्तु अपने व्यक्तिगत व्यवसाय या सुख - सुविधा से ही बचे रहने की उनकी प्रवृति ही नहीं थी। उनकी आंतरिक आकांक्षा के अनुसार , आध्यात्मिक साधना हेतु वे रामकृष्ण मठ क सारगाछी आश्रम चले गये। वहां वे कुछ महीने रहे और श्री रामकृष्ण के अनुयायी तथा स्वामी विवेकानन्द के गुरू - भाई स्वामी अखंडानन्द से मंत्र - दीक्षा ग्रहण की । उनके गुरू ने अपने अंतिम दिनों में उन्हें आश्रम के बाहर रहकर समाज की सेवा में लगने का आदेश किया । श्रीगुरूजी सन् 1937 ई. में नागपुर लौट आए और उसके बाद पूरे मन से संघ के कार्य में जुट गए। डाॅ हेडगेवार ने बड़ी बारीकी से उन्हें परख लिया और नागपुर के तृतीय वर्ष के प्रशिक्षण वर्ग के सर्वाधिकारी का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा तथा फिर सरकार्यवाह , ऐसे बढ़ाते हुए दायित्वों को सौंपने लगे।

श्री गुरूजी की बौद्धिक एवं मानसिक क्षमता के बारे में अपने वरिष्ठ सहयोगियों से परामर्श करने के बाद 1940 ई. में डाॅ. साहब ने अपने निधन के बाद सरसंघचालक का दायित्व श्री गुरूजी को सौंपे जाने का निश्चय प्रकट कर दिया।
RASHTRIYA SWAYAMSEVAK SANGH

श्री गुरूजी ने 33 वर्षों के लम्बे समय तक संगठन में मार्गदर्शक और दार्शनिक की भूमिका निभाई। अनवरत एवं अथक प्रयास करते हुए वे प्रत्येक प्रांत का वर्ष में दो बार भ्रमण करते थे। इस प्रकार कम से कम साठ बार उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया। संभवतः आज भी यह अपने आप में एक अद्वितीय कीर्तिमान है । श्री गुरूजी ने असम और केरल जैसे दूरस्थ प्रांतों तक कार्य विस्तार को तीव्र और ऊर्जावान गति प्रदान की । जब उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित हिन्दू पुनरूत्थान अभियान के कर्णधार के नाते बागडोर संभाली, तब हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना केवल एक कोरा चिंतन मात्र थी। परन्तु , अपनी असीम प्रतिभा के बल पर उन्होंने हिन्दू राष्ट्र की ऐतिहासिक , सामाजिक पृष्ठभूमि और शुद्ध अवधारणा अकाट्य रूप में प्रस्तुत की । इस प्रकार उन्होंने संघ के वैचारिक आधार को सामान्य ग्रामीण से लेकर नगरीय तक की समझ के अनुकूल बनाया। अपनी वाणी और कृति से उन्होंने शाखा-पद्धति को बारीकी से परिपूर्ण बनाया 1940 से पूर्व पूर्णकालिक प्रचारकों की परम्परा कम थी। उसे तेजी से बढ़ाकर पेरे देश में शाखाओं के व्यवस्थित विस्तार के लिए एक सशक्त अंग के रूप में स्थापित करने का भी श्रेय श्रीगुरूजी को है।

जब गुरूजी ने संघ की बागडोर संभाली , उस समय देश की स्थिति बहुत नाजुक बनी हुई थी। सर्वत्र स्वराज्य की चर्चा चल थी। संघ जैसे संगठन की प्रासंगिकता पर अनेक शंकाएं और जिज्ञासाएं उठाई जा रही थी। श्री गुरूजी शांति से और सुसंगत ढंग से समझाते थे कि किस प्रकार एक सुसंगठित समाज ही स्वराज्य को सुरक्षित रख कर उसके फलों का आस्वादन कर सकता है । उन्होने यह भी समझाया कि राष्ट्रीयता की सही अवधारणा क्या है तथा स्वराज्य के लिए वह शुद्ध दर्शन ही प्रेरक बन सकता है। देशव्यापी दंगो और हिन्दुओं के ग्राम - सम्पत्ति एवं  मानबिंदुओं पर आक्रमणों की भयावह परिस्थिति में श्री गुरूजी वीरोचित मुद्रा में दृष्टिगोचर हुए। उन्होंने अविराम पूरे देश की यात्रा की - विशेषतः पंजाब और सिन्ध की - और जनता के मनोबल को दुर्दम्य बनाया तथा त्याग और बलिदान की चेतना जगाई। उनके आह्वान का स्वयंसेवकों ने जिस प्रकार प्रतिसाद दिया और नारकीय इस्लामिक उन्माद से हिन्दू भाइयों और बहिनों के प्राण व सम्मान की रक्षा की, इसकी रोमांचक गाथा श्री गुरूजी के प्रेरणादायक नेतृत्व की उज्ज्वल साक्षी है।

श्री गुरूजी के फौलादी नेतृत्व की परीक्षा एक बार फिर हुई, जब केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने , तुच्छ दलीय उद्देश्य से , महात्मा गांधी की हत्या का फायदा उठाकर सन् 1948 में संघ पर प्रतिबन्ध लगाया, अत्यंत भड़काऊ और विद्वेषपूर्ण प्रचार किया। श्री गुरूजी की गिरफ्तारी के विरूद्ध संघ बड़ी निर्भीकता से उठ खड़ा हुआ और सत्याग्रह के उन्मेष की वेला में सम्पूर्ण देश में स्वयंसेवकों की गिरफ्तारियां और यातनाओं ने राष्ट्र के अंतःकरण को झकझोर दिया। फलतः सरकार को प्रतिबंध उठाना पड़ा।

किन्तु इस विजय के पश्चात् स्वयं स्फूर्त प्रचण्ड जन - स्वागत के बाद भी श्री गुरूजी ने अपना संयम बनाए रखा और स्वयंसेवकों से आग्रह किया कि वे भावावेश में आकर विरोध एवं विद्वेष के शिकार न हों तथा नवार्जित स्वातंत्रय को सुदृढ़ करने में राष्ट्र के कर्णधारों का सहयोग करें । उदाहरण के रूप में 1947 के देश - विभाजन के बाद जब कश्मीर का भाग्य अंधकार में लटक रहा था तब श्री गुरूजी, सरदार पटेल के कहने पर महाराजा से मिले और भारत में अविलम्ब विलय के लिए उनको तैयार किया। आगे फिर श्री लालबहादुर शास्त्री के निमंत्रण पर 1965 में पाक - आक्रमण के समय सर्वदलीय बैठक में भाग लिया और प्रभावी प्रतिरोधात्मक सही रणनीति निर्धारित करने में सहायता की।

अब हिन्दू राष्ट्र के नवोत्थान की संकल्पना को मूर्त रूप देने में संघ की नवीन भूमिका स्पष्ट शब्दों में निरूपित करने का कठिन कार्य सामने आया। राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के प्रत्येक क्षेत्र में कार्यरत - अखिल भारतीय विद्यार्थी  , भारतीय मजदूर संघ , विश्व हिन्दू परिषद , भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती तथा सेवा कार्य जैसे अनेक संगठनों का निर्माण हुआ। आगे चलकर आपने गोवंश जैसे राष्ट्रीय मान बिन्दुओं के प्रति राष्ट्र के अंतःकरण में सोई हुई श्रद्धा जगाने के लिए जन - जागरण के माध्यम से एक विशाल अभियान प्रारम्भ किया। श्री गुरूजी की ही प्रेरणा से संघ के स्वयंसेवक 1963 में स्वामी विवेकानंद जी की जन्म शताब्दी के ऐतिहासिक अवसर पर हिन्दू पुनरूत्थान का उनका ओजस्वी संदेश चारों ओर प्रसारित करने और कन्याकुमारी के समुद्र में भव्य विवेकानंद शिला स्मारक खड़ा करने के लिए अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ कूद पड़े।

भारत के सर्वसाधारण समाज तथा प्रबुद्ध वर्ग से समान रूप से निकट संपर्क होने के कारण श्रीगुरूजी राष्ट्र की धड़कन से सदैव परिचित रहते थे। इस कारण कई बार आने वाली घटनाओं का उनको पूर्वाभास हो जाता था। जिसकी वह शासकों तथा समाज को तथा लोगों को चेतावनी भी देते रहते थे। छठी दशाब्दी के प्रारम्भ में जब सरकार ने अपनी पूर्व वचन - बद्धता के कारण भाषावार प्रान्त रचना के लिए एक त्रिसदस्यीय आयोग की नियुक्ति की , उस समय श्री गुरूजी ने अकेले ही इसके संभाव्य परिणामों के बारे में चेतावनी दी और एकात्मक शासन प्रणाली के लिए आग्रह किया। उसी समय उत्तर - पूर्वी राज्यों में फैली अशांति को लेकर उन्होंने ईसाई मिशनरियों की उन राष्ट्रविघातक गतिविधियों की शासनाधीशों को चेतावनी दी, जिनके कारण आज देश को भारी मूल्य चुकाना पड़ रहा है। पांचवीं दशाब्दी के मध्य में जब हमारे राजनेता ‘‘ हिन्दी - चीनी भाई भाई ’’ का राग अलाप रहे थे तब गुरूजी ने सार्वजनिक रूप से कितना सही परामर्श दिया था कि इस थोथे शब्द - जाल के धोखे में न आएं। अपनी सीमाओं की सुरक्षा की सुदृढ़ व्यवस्था करें। उन्होंने पहले हीे चीन के दुष्ट मंसूबो को समझ लिया था कि वह हमको भुलावे में रखकर सीमा - पार से हमारे ऊपर आक्रमण करना चाहता है । सन् 1961 की जनगणना से पहले जब पंजाब समस्या प्रारंभिक अवस्था में थी, उनका ही एकमात्र साहसपूर्वक , विवेकपूर्ण आह्वान था कि सहजधारी हिन्दू अपनी मातृभाषा पंजाबी लिखाएं तथा सभी सिख बंधु अपने को हिन्दु लिखाएं।

आज यह हम देख सकते हैं कि उनकी प्रत्येक चेतावनी ‘ भविष्यवाणी ’ सिद्ध हुई तथा उनकी अवहेलना के कैसे दुष्परिणाम निकले है। श्री गुरूजी की प्रथम चिंता का विषय हमेशा यही रहा कि हिन्दू समाज में आंतरिक विघटन एवं विभेद समाप्त हों। शंकर , मध्व , रामानुज तथा अन्य पीठाधिष्ठित धर्माचार्यों को सहमत कर लेने वाले , उनके अनुनय-विनय का ही परिणाम था कि उन्होंने पहले कर्नाटक विश्व हिन्दू परिषद के उड्डपी सम्मेलन में तथा बाद में प्रयाग के 1996 में हुए विश्व हिन्दू सम्मेलन में सर्वसम्मति से छुआछूत , जातिवाद , वर्गवाद आदि बुराइयों को समाप्त करने की घोषणा की और हिन्दू समाज का समरसतापूर्ण एकता के लिए आह्वान किया।

इस प्रकार हिन्दू राष्ट्र के नवोत्थान के आदर्श के प्रति असंदिग्ध प्रतिबद्धता होने के कारण उन्होंने एक महान ध्येय से अनुप्राणित , अनुशासित विशाल संगठन खड़ा करने में सफलता पाई। अपनी मृत्यु से पूर्व श्री बालासाहब देवरस ( मधुकर दत्तात्रेय देवरस ) जी के सुयोग्य हाथों में अपना उत्तराधिकार लिखित रूप में उन्होंने सौंप दिया।

5 जून 1973 को उनकी जीवन लीला समाप्त हुई । वह अपने पीछे छोड़ गये संघ की सतत विकासोन्मुखी प्रेरणादायक परंपरा। संक्षेप में उनका गतिशील कर्तव्य उनके आशा और विश्वास से युक्त अंतिम संदेश में मूर्तिमन्त हो उठा, जो उन्होने 1973 की नागपुर की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के सम्मुख दिया कि अंततोगत्वा संघ अपने उद्देश्य में सफल होकर रहेगा। उनके शब्द थे - ‘‘ सर्व दूर विजय ही विजय है। ’’

शनिवार, 7 मार्च 2020

Rashtriya Swayamsevak Sangh ke sansthapak - 2

स्वतंत्रता का लक्ष्य -

Rashtriya Swayamsevak Sangh/Founder

विदर्भ के सभी छोटे - बड़े कार्यकत्र्ताओं की यह तीव्र इच्छा थी कि नागपुर का अधिवेशन लोकमान्य तिलक की अध्यक्षता में हो। किन्तु उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी, क्योंकि उसके पहले ही 1 अगस्त , 1920 को मृत्यु ने उन्हें छीन लिया। इस दुःखद समाचार के नागपुर पहुँचने पर यह प्रश्न उठा कि अब अध्यक्ष कौन बने ? नागपुर के गरमदलीय नेताओं ने पाण्डिचेरी में साधना कर रहे पुराने क्रान्तिकारी श्री अरविन्द घोष को निमन्त्रित करने का निश्चय किया। डाॅ. मुंजे और डाक्टर हेडगेवार अरविन्द बाबू से मिलने पाण्डिचेरी गये और उनसे अध्यक्षता स्वीकार करने का बहुत आग्रह किया। किन्तु आध्यात्मिक साधना का मार्ग अपना लेने वाले अरविन्द बाबू पुनः राजनीति में आने के लिए नहीं हुए । तब कांग्रेस के नरमपंथियों में से ही श्री विजयराघवाचारी को अध्यक्ष पद के लिए चुना गया। डाक्टर साहब को यह नाम पसंद नहीं था, किन्तु एक बार चयन हो जाने के बाद उन्होंने अधिवेशन की सफलता के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। अधिवेशन में आये साढ़े चैदह हजार प्रतिनिधियों की सुख - सुविधा और अन्य व्यवस्थाएँ सँभालने के लिए डाॅ. ल. वा. परांजपे और डाॅ. हेडगेवार के नेतृत्व में एक स्वयंसेवक दल का गठन किया गया था । यह सारी जिम्मेदारी उन्होंने इतने अच्छे ढंग से निभायी कि वे सभी की प्रशंसा के पात्र बन गये। 

   इस अधिवेशन में खिलाफत आन्दोलन की सहायता करने का प्रस्ताव पारित हुआ। सच पूछा जाय तो मुसलमानों के सहयोग को आवश्यकता से अधिक महत्व देने की गांधी जी की निती डाक्टर साहब का मान्य नहीं थी। अपनी बात उन्होंने गांधी जी तक पहुँचायी भी। डाक्टर साहब ‘सम्पूर्ण स्वतंत्रता’ शब्दों के प्रयोग का अत्यधिक आग्रह करते थे। उन्होने प्रयत्नपूर्वक यह प्रस्ताव भी स्वागत - समिति से पारित करवाकर विष्य - समिति के पास भिजवाया था कि ‘‘ हिन्दुस्थान में लोकतंत्र की स्थापना कर पँूजीवादी राष्ट्रों के चंगुल से देश को मुक्त कराना ही कांग्रेस का ध्येय है।’’ किन्तु तत्कालीन कांग्रेस के नेताओं को विचारों की इतनी ऊँची छलांग रास नहीं आयी। अतः ये दोनों ही सुझाव रद्दी की टोकरी में डाल दिये गये।

जब डाॅक्टर साहब जेल गए - 


डाक्टर साहब का यह मत था कि यदि किसी संस्था में काम करने का निश्चय किया है तो मतभेदों के होते हुए भी उस संस्था के निर्णयों को सिर- आँखों पर स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने इसका पालन किया। गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस ने ‘ खिलाफत’ के समर्थन में असहयोग आन्दोलन से स्वराज्य निकट आयेगा या देश को और कोई विशेष लाभ होगा। फिर भी यह सोचकर कि इससे देश में जागृति - निर्माण करने का कम से कम एक अवसर तो मिलेगा , वे आन्दोलन में कूद पड़े और तूफानी दौरा कर अपने उग्र भाषणों और कार्यो से उन्होंने विदर्भ के ग्रामीण भाग में हलचल मचा दी । 

इस कार्य के कारण उन पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया गया। गांधी जी का मत था कि आन्दोलन में जिन पर मुकदमें चलाये जायंे वे अपना बचाव न कर सजा स्वीकार कर लें। किन्तु डाक्टर साहब ने अदालत के मंच को भी राष्ट्रीय विचारों के प्रचार का माध्यम बनाने हेतु मुकदमा लड़ा और सरकारी रिपोर्टरों के होश ठिकाने लगा दिये। अदालत में दी गयी उनकी सफाई उग्र देशभक्ति से इतनी सराबोर और इतनी तीखी भाषा में थी कि न्यायाधीश को भी कहना पड़ा कि उनका ‘‘ बचाव का भाषण मूल भाषण से भी अधिक राजद्रोहात्मक है।’’ डाॅ. साहब को एक वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हुई जिसे उन्होंने प्रसन्नता से काटा।

Rashtriya Swayamsevak Sangh Ke Sansthapak - 1

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गत 95 वर्षों में न केवल देशव्यापी हुआ है अपितु भारत के राष्ट्रजीवन में उसने अपना एक महत्वपूर्ण स्थान भी बना लिया है। देश के सामने विद्यमान समस्याओं का राष्ट्रीयता की भावात्मक अवधारणा के निकष पर निदान करने की संघ की परम्परा होने के कारण उसके मत को प्रबुद्ध लोकमानस में विशेष महत्व भी प्राप्त हुआ है। किन्तु इतना सब होते हुए भी संघ के संस्थापक डाॅक्टर केशव बलिराम हेडगेवार का नाम एवं उनका जीवन संघ-बाह्य क्षेत्र में अल्पज्ञात ही है। यह डाॅक्टर हेडगेवार जी के आत्मविलोपी स्वभाव का ही स्वाभाविक परिणाम है।
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RASHTRIYA SWAYAMSEVAK SANGH FOUNDER
यह लेख डाक्टर हेडगेवार जी जीवन , विचार एवं कृतित्व के सम्बन्ध में समाज को अवगत कराने हेतु एक प्रयास है। डाॅक्टर जी के व्यक्तित्व में बीजरूप में विद्यमान गुणों एवं उनके द्वारा की गयी कृतियों की अभिव्यक्ति संघरूपी विशाल वटवृक्ष के अंग-प्रत्यंग में किस प्रकार हुई है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम आज केवल भारत में ही नहीं दुनिया भर में फैल चुका है। सभी मानते है कि आर. एस. एस. हिन्दुओं का एकमेव प्रभावी संगठन है। संघ के विरोधी भी इस बात से इन्कार नहीं कर पाते कि भारत के राष्ट्रजीवन में संघ का अपना एक विशेष स्थान है। तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि इस संगठन का प्रारम्भ कब, किसने , कहाँ और क्यों किया ? 

संघ के जन्मदाता का जीवन कैसा था? ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले इस संगठन का निर्माण करने कि प्रेरणा उन्हें कहाँ से मिली ? संघ आरम्भ में जैसा था अव भी वैसा ही है या उसमें कोई परिवर्तन हुआ है? आदि । 
संघ निर्माता के जीवन और कार्य के सम्बन्ध में कुछ विचार कर लिया जाये।

जन्मजात देशभक्त - 

      डाॅ. हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 ई. को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन नागपुर के एक गरीब वेदपाठी परिवार में हुआ था। जन्म के समय किसी भी प्रकार की अनुकूलता उन्हें प्राप्त नहीं थी। पुरोहिती कर आजीविका चलाने वाला उनका परिवार नागपुर की एक पुरानी बस्ती में निवास कर रहा था। घर का वातावरण आधुनिक शिक्षा और देश के सार्वजनिक जीवन से सर्वथा अछूता था। किन्तु जन्म से ही भगवान ने डाॅ. साहब को एक अनोखी देन दी थी जिसके बल पर वे अपने जीवन को कर्तृव्यवान, परिस्थिति को बदलने की क्षमता रखने वाला और आदर्श बना सके। यह ईश्वरीय देन थी - जन्मजात देशभक्ति और समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता। उमर के आठवें वर्ष में ही उसका परिचय केशव के संगी - साथियों , पड़ोसियों और घर के लोगों को मिलने लगा था। इस उमर में ही उनके मन में ऐसा भव्य विचार आया कि इंग्लैण्ड की रानी विक्टोरिया का राज्य पराया है और उसके साठ साल पूरे होने की खुशी में जो मिठाई बाँटी गयी उसे खाना हमारे लिए लज्जा की बात है , और मिठाई का वह दोना उन्होंने एक कोने में फेंक दिया। चार साल बाद सातवें एडवर्ड का राज्याभिषेक - समारोह जब बड़े ठाठ - बाट से मनाया गया तब उसमें भी केशव ने भाग नहीं लिया । बाल केशव ने कहा - ‘‘ पराये राजा का राजा का राज्यभिषेक - समारोह मनाना हम लोगों के लिए घोर लज्जा की बात है । ‘‘ 
विद्यालय में पढ़ते समय नागपुर के सीतावर्डी किले पर अंग्रेजों के झण्डे ‘ यूनियन जैक’ को देखकर उन्हें बड़ी बेचैनी होती थी और मन में एक दिन एक अनोखी कल्पना उनके मन में उभरी कि किले तक सुरंग खोदी जाय और उसमें से चुपचाप जाकर उस पराये झण्डे को उतारकर उसकी जगह अपना झण्डा लगा दिया जाय । तदनुसार उन्होने अपने मित्रों सहित सुरंग खोदने का काम शुरू भी किया था। लेकिन उनके गुरू जी ने जब सुरंग का काम देखा तो उन्हें रोक दिया । 

देशभक्ति - जीवन का स्वर 

यह जो क्रियाशाील देशभक्ति का भाव डाॅक्टर हेडगेवार के बचपन में प्रकट हुआ, वही उनके जीवन में अखण्ड रूप से बना रहा और उनके सारे जीवन को प्रकाशित करता रहा। वे जब नागपुर के नीलसिटी हाईस्कूल में पढ़ रहे थे, तभी अंग्रेज सरकार ने कुख्यात रिस्ले सक्र्युलर जारी किया। इस परिपत्र का उद्देश्य विद्यार्थियों को स्वतन्त्रता के आन्दोलन से दूर रखना था। नेतृत्व का गुण केशवराव हेडगेवार में विद्यार्थी अवस्था से ही था। शाला के निरीक्षण के समय उन्होंने प्रत्येक कक्षा में निरीक्षक का स्वागत ‘ वन्दे मातरम्‘ की घोषणा से कराने का निश्चय किया और उसे सफलता के साथ पूरा कर दिखाया। विद्यालय में खलबली मच गयी , मामला तूल पकड़ गया और अन्त में उस सरकार - मान्य विद्यायल से उन्हें निकाल दिया गया। फिर  यवतमाल की राष्ट्रीय शाला में उन्होंने मैट्रिक की पढ़ाई की , किन्तु परीक्षा देने के पूर्व ही वह शाला भी सरकारी कोप का शिकार हो गयी। इसलिए उन्हें परीक्षा देने अमरावती जाना पड़ा । 
जब कोई राष्ट्र गुलाम होता है तब देशभक्ति से जलते अन्तःकरण बड़े ही संवेदनशील हो जाया करते हैं। केशव निर्भीक और साहसी थे तथा देश के लिए किसी भी प्रकार का त्याग करने के लिए तैयार थे। उन्होंने सन् 1910 में कलकत्ते के नेशनल मेडिकल काॅलेज में डाक्टरी की शिक्षा के लिए प्रवेश लिया ताकि उनका बंगाल के क्रान्तिकारियों से सम्पर्क आ सके और बाद में वे वैसा ही कार्य विदर्भ में कर सकें । वहाँ पुलिनबिहारी दास के नेतृत्व में अनुशीलन समिति नामक क्रांतिकारियों की एक टोली काम कर रही थी। इस समिति के साथ केशवराव का गहरा सम्बन्ध स्थापित हुआ और वे उसके अंतरंग में प्रवेश पा गयें।
                                                                                        


शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

Deendayal Upadhyaya/एकात्मवाद के प्रणेता:- पंडित दीनदयाल उपाध्याय भाग - 1



Deendayal Upadhyaya

Deendayal Upadhyaya/एकात्मवाद के प्रणेता:- पंडित दीनदयाल उपाध्याय   भाग - 1
Deendayal Upadhyaya/एकात्मवाद के प्रणेता:- पंडित दीनदयाल उपाध्याय   भाग - 1
https://en.wikipedia.org/wiki/Bharatiya_Janata_Partyपंडित दीनदयाल उपाध्याय के पिता श्री  भगवती प्रसाद गांव नगला चन्द्रभान जिला मथुरा के निवासी थे। तत्कालीन सामाजिक परम्परा के अनुसार उनकी मां श्रीमती रामप्यारी अपने प्रथम प्रसव के लिए अपने पिता श्री चुन्नी लाल के यहां गई थी। श्री चुन्नी लाल राजस्थान में जयपुर के पास धनकिया में स्टेषन मास्टर थे,  वहीं दीनदयाल जी का जन्म 25 सितम्बर, 1916 को हुआ।

दीनदयाल जी के जन्मकाल के नक्षत्र एवं लक्षण विलक्षण थे । ज्योतिशियों ने उनके बारे में भविश्यवाणी की थी कि यह बालक अत्यन्त विलक्षण एवं 
प्रतिभाषाली होगा। विद्या एवं ज्ञान  में अग्रणी रहेगा। समाज तथा राश्ट्र की सेवा का व्रत धारण करेगा। देष-विदेष में सम्मान प्राप्त करेगा। यह
दलितों , षोशितों का उध्दार करने का बीड़ा उठायेगा। यह विवाह भी नहीं करेगा।

दीनदयाल जी के पिताजी रेलवे में कर्मचारी थे, इनका एक छोटा भाई भी था। इनकी माता जी दोनो बच्चों के साथ अपने मायके में थी। अभी इनकीआयु ढ़ाई वर्श की थी कि उसी समय इनके पिताजी का देहांत हो गया। माता जी को बड़़ा आघात लगा।उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। कुछ दिनोंके बाद उनका भी देहांत हो गया। तब दीना की आयु 7 वर्श की थी।

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Deen dayal Upadhyaya


दीनदयाल जी के नाना श्री चुन्नी लाल दोनांे बच्चों को लेकर अपने गांव आ गये, वह भी रेलवे विभाग में स्टेषन मास्टर थे। कुछ समय के बाद नाना चुन्नी  लाल ने दोनों बच्चों को अपने मामा राधारमण के पास गंगापुर में भेज दिया। वहां पर दीना ने स्कूल में प्रवेष लिया। इस समय दीना की आयु 9 वर्श थी।

कुछ दिन के बाद मामा राधारमण को क्षयरोग हो गया। क्षय रोग छुआछूत की बीमारी होने के कारण स्थानीय चिकित्सकों ने इलाज करने से मना कर 
दिया । लखनऊ में एक पारिवारिक सम्बन्धी चिकित्सा विभाग में कार्यरत थे। उन्होंने श्री राधारमण को अपने यहां आने के लिए कहा पर मामा के साथ
कोई व्यक्ति जाने को तैयार नहीं हो पाया तो दीना ही मामा के साथ लखनऊ गये जिससे इनकी पढाई रूक गई। जैसे ही मामा की तबियत कुछ ठीक
हुई। दीना वापस गंगापुर आये और स्कूल की परीक्षा में बैठे और कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया।


दीनदयाल जी ने आगे की पढाई के लिए कोटा के एक विद्यालय में 5वीं कक्षा में प्रवेष लिया। वहां इन्होनें छात्रावास में रहते हुये कक्षा 7 तक की पढाई
की इसके पष्चात् वह अध्ययन हेतु राजगढ़ गये जहां उनके एक अन्य चचेरे मामा श्री नारायण षुक्ल स्टेषन मास्टर थे। 
सन् 1934 में इनके छोटे भाई शिवदयाल को टाइफाइड हो गया। जो ठीक न हो सका और उनका देहांत हो गया। भाई से बहुत स्नेह तथा आत्मीयता
थीं । इसी  बीच उनके चचेरे मामा का भी राजगढ से सीकर स्थानान्तरण हो गया। सीकर में उनका प्रवेष 10वीं कक्षा में हुआ था। परीक्षा से कुछ दिन
पहले वह बीमार हो गये। और इलाज हेतु उन्हें मामा राधारमण के पास जाना पडा। ठीक होकर वापस लौटे और सम्पूर्ण अजमेर बोर्ड में प्रथम स्थान 
प्राप्त किया। इससे प्रसन्न होकर सीकर के महाराजा ने उनको एक स्वर्ण पदक तथा  250रूपये का पुरस्कार दिया। 10 रूपये मासिक छात्रवृति भी प्रदान 

किया।  
            ............................................................आगे जारी
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प. पू. डाॅ. हेडगेवार जी के विचार

हमारा  कार्य सम्पूर्ण समाज के लिए होने के कारण , उसके किसी भी अंग की उपेझा करने से काम नहीं चलेगा। समस्त हिन्दू बांधवों से फिर वे किसी भी श्...