शनिवार, 19 सितंबर 2020

मौसमी पवन है मानसून Monsoon is the seasonal wind



 मानसून शब्द मूल रूप से अरबी भाषा के मौसिम से बना है, जिसका मतलब मौसम से हैं। मानसून शब्द का प्रयाग सबसे पले अरब सागर में चलने वाली उन हवाओं के लिए किया गया था, जो गर्मी में दक्षिण - पश्चिमी से और सर्दी में उत्तर पूर्व की ओर चलती है। इसके बाद संसार में उन सभी भागों की हवाओं को मानसून कहा जाने लगा, जिनकी दिशा में ऋतुवत बदलाव हो जाता है। मानसून का मतलब मौसम के मुताबिक हवाओं में होने वाला बदलाव है, जिसकी वजह से बरसात में भी बदलाव आता है। इस तरह मानसून धरातल पर चलने वाली वे हवाएं हैं , जो गर्मी और सर्दी की ऋतुओं को प्रवाह की दिशा बदल लेती है। हवाओं की दिशा बदलने की वजह वायुदाब में होने वाला बदलाव है और वायुदाब में बदलाव तापमान के बदलाव के साथ होता है। वायुदाब और तापमान में गहरा संबंध है । ताप बढ़ने पर वायु का आयतन बढ़ता है और यह फैलकर हल्का हो जाता है। इससे उसका दाब कम हो जाता है।


इसके विपरीत तापमान कम होने से वायु सघन हो जाती है और उसका दबाव बढ़ जाता है। पवनें हमेशा ज्यादा वायुदाब से कम वायुदाब की ओर प्रभावित होती है। यही संतुलन हमारे यहां  ग्रीष्मकालीन मानसून लाने में बड़ी भूमिका अदा करता है। 21 मार्च के बाद सूर्य उत्तरायण होने लगता है और 21 मार्च के बाद सूर्य उत्तरायण होने लगता है और 21 जून को यह कर्क रेखा पर लंबवत् होता है। इस दौरान बहुत ज्यादा सूर्यातप की वजह से एशिया में बैकाल झील और उत्तर - पश्चिमी पाकिस्तान में न्यून वायुदाब केन्द्र स्थापित हो जाते हैं। इसके विपरीत दक्षिणी हिन्द महासागर और उत्तर - पश्चिमी आॅस्ट्रेलिया के पास व जापान के दक्षिण में प्रशांत महासागर में उच्च दाब केन्द्र विकसित होते है। महासागरों में स्थित उच्च दाब केन्द्रों से स्थलीय निम्न दाब केन्द्र की ओर पवन चलने लगती है, जो आर्द्र होने के कारण वर्षा कराती है। इसके बाद 23 सितंबर से सूर्य दक्षिणायन होने लगता है और 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर लंबवत चमकता है, इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में पश्चिमी पाकिस्तान के पास उच्च दाब केन्द्र विकसित होते है। इस वजह से पवनें स्थल से सागर की ओर चलने लगती है। शुष्क होने के कारण ये वर्षा नहीं करा पाती । मध्य आंक्षाशों में चक्रवाती तूफान जाड़े के मानसून में कई बाधाएं खड़ी कर देते है । इन तूफानों के कारण कुछ वर्षा हो जाती है। 

इसके अलावा स्थल और जल के मध्य दैनिक तापमान की विषमता छोटे स्तर पर दैनिक मानसून उत्पन्न करती है, जिसे स्थल और समुद्र समीर कहा जाता है। सुबह व रात में ठंडी हवा स्थल से समुद्र की ओर चलती है। दिन में गर्मी के कारण स्थल ज्यादा गर्म हो जाता है , जिससे हवा गर्म हो जाती है व वायुदाब कम हो जाता है। इसकी वजह से हवा समुद्र से स्थल की ओर चलने लगती है। ये हवाएं तटीय क्षेत्र को आरामदायक बना देती है। व्यापक अर्थ में मानसून उस पवन को कहते हैं जो किसी क्षेत्र में किसी ऋतु विशेष में अधिकांश वर्षा कराती है। इस दृष्टि से संसार के अन्य क्षेत्र जैसे - उत्तरी अमेरिका , दक्षिणी अमेरिका , सब - सहारा अफ्रीका, आॅस्ट्रेलिया और पूर्वी एशिया को भी मानसून क्षेत्र की श्रेणी में रखा जा सकता है।



भारत में मानसून 


भारतीय संदर्भ में मानसून एक मौसमी पवन है, जो दक्षिणी एशिया में लगभग चार माह (जून से सितम्बर) तक सक्रिय रहती है। ये हिन्द महासागर और अरब सागर की तरफ से भारत के दक्षिण पश्चिमी तट पर आने वाली हवाएं हैं जो भारत, पाकिस्तान , बांग्लादेश आदि में भारी वर्षा कराती है। आर्द्रता से लदी इन पवनों के साथ ही बादलों का प्रचंड गर्जन और बिजली का चमकना शुरू हो जाता है। इसे मानसून ‘फटना‘ या ‘टूटना‘ कहा जाता है। भारतीय मौसम विभाग की परिभाषा के अनुसार वर्षा का दिन वह होता है जब किसी स्थान विशेष पर इसकी मात्रा 24 घंटे में 2.5 सेमी से ऊपर हो। भारतीय अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक प्रभाव मानसून डालता है। यहां की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है और यहां के कुल फसल क्षेत्र का 4/5 भाग सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर है। दक्षिण भारत की अनेक नदियां , जो अनेक आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र है, वर्षा से ही जल प्राप्त करती है। मानसून के शीघ्र या देर से आने से  यहां की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। वार्षिक वर्षा का अधिकांश भाग दक्षिण - पश्चिमी मानसून से ग्रीष्म ऋतु में प्राप्त होता है। इसके अलावा शीतकाल में शीतोष्ण चक्रवातों द्वारा गंगा के मैदानों में व ग्रीष्मकाल में उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों द्वारा तटीय क्षेत्रों में वर्षा होती है।




दक्षिण - पश्चिमी मानसून

भारत में ज्यादातर बरसात इसी मानसून की वजह से होती है। यहां गर्मी की ऋतु के बाद वर्षा ऋतु का आगमन दक्षिण - पश्चिमी मानसून के साथ होता है। तकरीबन पूरे भारत में जून, जुलाई, अगस्त  और सितम्बर के महीनों में अधिकतर बरसात होती है और इस अवधि की लगभग 75 - 80 फीसदी बरसात इन्ही पवनों की वजह से होती है। गर्मियों में उत्तर - पश्चिमी मैदानी भागों   में तापमान बढ़ने की वजह से वायुदाब कम हो जाता है। जून की जबरदस्त गर्मी की वजह से यहां का वायुदाब इतना कम हो जाता है कि दक्षिणी गोलार्द्ध की दक्षिणी - पूर्वी सन्मार्गी हवाएं भूमध्य रेखा को पार कर भारत के निम्न वायुदाब की ओर चली आती है। दक्षिणी गोलार्द्ध की दक्षिण - पूर्वी पवनें समुद्र में पैदा होती है। हिन्द महासागर में विषुवत वृत्त को पार कर ये पवनें बंगाल की खाड़ी व अरब सागर में आ जाती है और यहां आने के बाद भारत के वायु संचरण का अंग बन जाती है। विषुवतीय गर्म धाराओं के ऊपर से गुजरने की वजह से ये बड़ी मात्रा में आर्द्रता ग्रहण कर लेती है और विषुवत वृत्त पार करते ही दक्षिण - पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। यही वजह है कि इन्हें दक्षिण पश्चिमी मानसून पवनें ले लेती है। इन पवनों की औसत गति 30 किमी प्रतिघन्टा होती है। उत्तर - पश्चिमी भागों को छोड़कर ये तकरीबन एक महीने में पूरे भारत में फैल जाती है।


अरब सागर का मानसून 

विषुवत रेखा के दक्षिण से आने वाली स्थायी पवनें मानसून के रूप में अरब सागर की ओर आगे बढ़कर सबसे पहले पश्चिमी घाट के पहाड़ से टकराती है। इस कारण सहयाद्रि या पश्चिमी घाट के पवनाभिमुख ढालों पर भारी बरसात होती हैं। पश्चिमी घाट के पर्वत को पार करते समय इनकी आर्द्रता कम हो जाती है। यही वजह है कि दक्कन के पठार और मध्यप्रदेश में कम वर्षा होती है। यह क्षेत्र वृष्टिछाया के दायरे में आ जाता है। इस मानसून की शाखा का दूसरा भाग सौराष्ट्र के प्रायद्वीप और कच्छ से हो कर पश्चिमी राजस्थान और अरावली की श्रेणियों के ऊपर से गुजरती है। यहां इनसे बहुत कम बरसात होती है। इसके बाद पंजाब और हरियाणा में पहंुचकर यह शाखा बंगाल की खाड़ी के मानसून में मिल जाती है। आपस में एक - दूसरे से शक्ति पाकर ये दोनों शाखाएं हिमालय के पश्चिमी भागों में वर्षा करती है।




बंगाल की खाड़ी का मानसून 


दक्षिण - पश्चिमी मानसून की यह शाखा भूमध्य रेखा को पार कर भारत में पूरब की ओर से दाखिल होती है। यह शाखा म्यांमार के तट की ओर व बांग्लादेश के दक्षिण - पूर्वी  भागों के तट की ओर बढ़ती है, लेकिन म्यांमार के तट पर फैली अराकन पहाड़ियां इस शाखा के एक बड़े भाग को भारतीय उपमहाद्वीप की दिशा में मोड़ देती है। यही वजह है कि पं. बंगाल व बांग्लादेश में ये पवनें दक्षिण दिशा की बजाय दक्षिण व दक्षिण - पूर्वी दिशाओं से आती है। इसके बाद विशाल हिमालय व उत्तर - पश्चिमी भारत के कम वायुदाब की वजह से यह शाखा दो भागों में बंट जाती है। एक पश्चिमी की ओर बढ़कर गंगाा के मैदान तक पहुंचती है और दूसरी शाखा उत्तर व उत्तर - पूरब में ब्रह्मपुत्र घाटी की ओर जाती है।  इस वजह से उत्तर - पूर्वी भारत में भारी बरसात होती है।  इसकी एक छोटी शाखा मेघालय में गारों और खासी की पहाड़ियों से टकराती है। इन पहाड़ियों के दक्षिणी भाग में चेरापूंजी स्थित है। चेरापूंजी और मासिनराम विश्व में सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान है और इसकी वजह इसकी आकृति वाली घाटी के शीर्ष पर स्थिति होना तथा स्थलाकृति की दृष्टि से अनोखी स्थिति होना है। 



बुधवार, 9 सितंबर 2020

हम युवा हैं Ham yuva hai

हम युवा हैं हम करें मुश्किलों से सामना ।

मातृभूमि हित जगे है हमारी कामना ।।


संस्कृति पली यहाँ , पुण्य भू जो प्यारी है।

जननी वीरों की अनेक , भरत भू हमारी है।।

ऐसा अब युवक कहाँ , दिल जिसके राम ना।।1।।


ज्ञान के प्रकाश की , ले मशाल हाथ में।

शील की पवित्रता , है हमारे साथ में।।

एकता के सुर उठे, छूने को ये आसमां।।2।।



ये कदम हजारों अब, रूक न पायेंगे कभी। 

मंजिलों पे पहुँच कर ही विराम ले सभी ।।

ध्येय पूर्ति पूर्व अब , रूक न पाये साधना।। 3।।


शनिवार, 21 मार्च 2020

जिंदगी में सफलता के लिए चाणक्य महान के महान सूत्र

"दूसरो की गलतियों से सीखो अपने ही ऊपर प्रयोग करके सीखने को तुम्हारी आयु कम पड़ेगी." 2)"किसी भी व्यक्ति को बहुत ईमानदार (सीधा साधा ) नहीं होना चाहिए ---सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं." 3)"अगर कोई सर्प जहरीला नहीं है तब भी उसे जहरीला दिखना चाहिए वैसे डंस भले ही न दो पर डंस दे सकने की क्षमता का दूसरों को अहसास करवाते रहना चाहिए. "  4)"हर मित्रता के पीछे कोई स्वार्थ जरूर होता है --यह कडुआ सच है." 5)"कोई भी काम शुरू करने के पहले तीन सवाल अपने आपसे पूछो ---मैं ऐसा क्यों करने जा रहा हूँ ? इसका क्या परिणाम होगा ? क्या मैं सफल रहूँगा ? " 6)"भय को नजदीक न आने दो अगर यह नजदीक आये इस पर हमला करदो यानी भय से भागो मत इसका सामना करो ." 7)"दुनिया की सबसे बड़ी ताकत पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता है." 8.) "काम का निष्पादन करो , परिणाम से मत डरो." 9)"सुगंध का प्रसार हवा के रुख का मोहताज़ होता है पर अच्छाई सभी दिशाओं में फैलती है." 10)"ईश्वर चित्र में नहीं चरित्र में बसता है अपनी आत्मा को मंदिर बनाओ." 11) "व्यक्ति अपने आचरण से महान होता है जन्म से नहीं." 12) "ऐसे व्यक्ति जो आपके स्तर से ऊपर या नीचे के हैं उन्हें दोस्त न बनाओ,वह तुम्हारे कष्ट का कारण बनेगे. सामान स्तर के मित्र ही सुखदाई होते हैं ." 13) "अपने बच्चों को पहले पांच साल तक खूब प्यार करो. छः साल से पंद्रह साल तक कठोर अनुशासन और संस्कार दो .सोलह साल से उनके साथ मित्रवत व्यवहार करो.आपकी संतति ही आपकी सबसे अच्छी मित्र है." 14) "अज्ञानी के लिए किताबें और अंधे के लिए दर्पण एक सामान उपयोगी है ." 15) "शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है. शिक्षित व्यक्ति सदैव सम्मान पाता है. शिक्षा की शक्ति के आगे युवा शक्ति और सौंदर्य दोनों ही कमजो

जन्मदिन कैसे मनाया जाए How To Celebrated The Birthday

आपको बदलनी अपनी किस्मत तो ऐसे मनाएं अपना जन्मदिन

जिस दिन हम पैदा हुए उस घर परिवार में हर तरफ खुशी का माहौल और मां पिता जी के लिए एक नया एहसास और खुशी जिसे शायद बयां करने के शब्द भी उनके पास ना हो. वही हो जाता है हमारा जन्मदिन उस दिन को जन्मदिन के रूप हर साल आनन्द करते है। लेकिन आज कल युवा उस दिन अपने मां पिता का आर्षीवाद लेने के बजाय माॅडर्न दिखने के चक्कर में ढ़ोग करते फिरते है , लेकिन इस सब के पीछे माता पिता भी जिम्मेदार हैं क्यूँकि वह अपने बच्चे बालपन से ही उस अपने संस्कारों की बजाय अंग्रेजियत लाद देते है.

इस धरती पर अवतरण के उस दिन को जन्मदिन के रूप में मनाते है और जन्मदिन की उस खुशी में हम पाश्चात्य सभ्यता के चकाचैंध में खो जाते है

जिस दिन मेरा जन्मदिन होता था मां सुबह ही पैर छूकर बड़ो का आशीर्वाद लेने को कहती , वैसे तो मेरे परिवार सभी जल्दी जागना, अपने से बड़ो को प्रणाम करना यह सभी कार्य एक नियमितता से होते है , लेकिन जिस दिन मेरा जन्मदिन होता था  वो दिन कुछ खास हो जाता है। 
सुबह जगकर बड़ो का आशीर्वाद लेने के बाद नित्य क्रिया स्नानादि से निवृत होकर मां पिता के साथ मन्दिर जाकर पूजा अर्चना करता उसके बाद कुछ दान करना और  फिर मां और दादी ,बहन , बुआ आदि मेरा तिलक करती और घर में दीप जलाकर उस सर्वशक्तिशाली ईश्वर का धन्यवाद और मेरे उज्जवल भविष्य की कामना करते थे। यह एक बहुत सुन्दर एहसास होता था।
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हमारी इस पद्धति को बहुत से लोग पिछड़ापन के कहते लेकिन हमें क्या फर्क पडना था। जन्मदिन के दिन दान देने के संस्कार ने मेरे अन्दर असहायांे की मदद की जो भावना उत्पन्न की वो मुझे हमेशा सुकून देती है। 
लेकिन आजकल के माहौल जन्मदिन की पार्टी के नाम पर हजारों रूपये उड़ा देते , नयेपन के नाम पर शराब , सिगरेट जैसे अन्य नशों का सेवन करते है। और फिर चरित्र का पतन करते है । और फिर कहते है हम  तो विकसित हो गये।

एक बार की एक घटना जो मेरे सामने घटी की एक लडकी को 4 लड़के जबरदस्ती गाड़ी में बिठा रहे थे तो इस घटना को देखने वालों कुछ लोगो ने पुलिस को सूचना करदी जब पुलिस उस स्थान पर पहुंची और उन लोगो को गिरफ्तार करने लगी तो उनमें एक लड़के बताया कि यह हमारी दोस्त है और मेरे जन्मदिन की पार्टी थी और इसने उस चक्कर में शराब ज्यादा पी ली और अब गाड़ी में बैठने से मना कर रही थी तो हम इस बिठा रहे थे, पुलिस उन सभी के मां पिता जी को सूचना कर बुलवाया।
  लेकिन सोचिए ? ये कैसा जन्मदिन की खुशी मनाना है जब मां बाप थाने में अपने बच्चों को देखा होगा तो क्या सोचा होगा , कितनी शर्मिन्दगी उठायी होगी । लेकिन आज युवा पीढ़ी विकास के पथ पर चलने की अपेक्षा विनास के राह अपना रही है।

इसलिए मैं यह सोचता हूँ कि अपने जन्मदिन पर हमें अपनी भारतीय पद्धति से जन्मदिन मनाना चाहिए ।
हम सभी को अपना जन्मदिन मनाने का बड़ा शौक होता है और उनमें उस दिन बड़ा उत्साह होता है लेकिन अपनी परतंत्र मानसिकता के कारण हम उस दिन भी अपने और अपने बच्चे के दिमाग पर अंग्रेजियत की छाप छोड़कर अपने साथ, उसके साथ व देश तथा संस्कृति के साथ बड़ा अन्याय कर रहे है।
जन्मदिन पर हम ‘ केक ’ बनवाते है तथा जन्म को जितने वर्ष हुए हों उतनी मोमबत्तियाँ ‘केक’ पर लगवाते है। उनको जलाकर फिर फूँक मारकर बुझा देते हैं।

जरा विचार तो कीजिये कि हम कैसी उल्टी गंगा बहा रहे है ! जहाँ दीये जलने चाहिए वहाँ बुझा रहे हैं! जहाँ शुद्ध चीज खानी चाहिए वहाँ फँूक मारकर उड़े हुए थूक से जूठे हुए ‘केक’ को हम बड़े चाव से खाते हैं! जहाँ हमें गरीबी को अन्न खिलाना चाहिए वहीं हम बड़ी पार्टियों का आयोजन कर व्यर्थ पैसा उड़ा रहे हैं! 
कैसा विचित्र है आज का हमारा समाज ?

हमें चाहिए कि हम बच्चों को उनके जन्मदिन पर भारतीय संस्कार व पद्धति के अनुसार ही कार्य करना सिखायें ताकि इन मासूमों को हम अंग्रेज न बनाकर सम्माननीय भारतीय नागरिक बनायें।
आपको बदलनी अपनी किस्मत तो ऐसे मनाएं अपना जन्मदिन

मान लो, किसी बच्चों का 11वाँ जन्मदिन है तो थोड़े से अक्षत (चावल) लेकर उन्हें हल्दी, कुमकुम , गुलाल , सिंदूर आदि मांगलिक द्रव्यों से रंग लें और उनसे स्वास्तिक बना लें । उस स्वास्तिक पर 11 छोटे छोटे दीये रख दें और 12 वें वर्ष की शुरूआत के प्रतीकरूप एक बड़ा दीया रख दें। फिर घर के बड़े सदस्यों से सब दीये जलवायें तथा बच्चा बड़ों को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद ग्रहण करे।


  • पार्टियों में फालतू का खर्च करने के बजाय अपने और  बच्चों के हाथों से गरीबों में , अनाथालयों में भोजन , वस्त्र इत्यादि का वितरण करवाकर अपने धन को सत्कर्म में लगाने के सुसंस्कार दृढ़ करें।



  • लोगों के पास से चीज वस्तुएँ लेने के बजाय हम अपने बच्चों को दान करना सिखायें ताकि उनमें लेने की वृत्ति नहीं अपितु देने की वृत्ति को बल मिले।



  • हमें उस दिन नये कार्य करवाकर उनमें देशहित की भावना का संचार करना चाहिए । जैसे - पेड़ - पौधे लगाना इत्यादि।



  • हमको इस दिन अपने गत वर्ष का हिसाब करना चाहिए यानी कि हमंने वर्षभर में क्या क्या अच्छे काम किये? क्या-क्या बुरे काम किये? जो अच्छे कार्य किये उन्हें भगवान के चरणों में अर्पण करना चाहिए और जो बुरे कार्य हुए उनको भूलकर आगे उन्हें न दोहराने व सन्मार्ग पर चलने का संकल्प करना चाहिए। 



  • अपने बच्चों से संकल्प करवाना चाहिए कि वे नये वर्ष में पढ़ाई, साधना , सत्कर्म , सच्चाई तथा ईमानदारी में आगे बढ़कर अपने माता-पिता व देश के गौरव को बढ़ायेंगे।


उपरोक्त सिद्धांतो के अनुसार अगर हम कदाचित् उन्हें भौतिक रूप से भले ही कुछ न दे पायें लेकिन इन संस्कारों से ही हम उन्हें भौतिक रूप से भले ही ऐसे महकते फूल बना सकते हैं कि अपनी सुवास से वे केवल अपना घर , पड़ोस , शहर , राज्य व देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को सुवासित कर सकेंगे।
उम्मीद करता हूँ कि आपको यह लेख अवश्य पसंद आया होगा
और आपसे एक विनती भी करता हूँ कि खुद माॅडर्न दिखाने के चक्कर खुद को बर्बाद मत करें। जिस भारतीय सभ्यता को विदेशी अपना रहे है हम उन्हीं से दूर जा रहे है।

अपनी संस्कृति अपनी पहचान 

कितनी सुन्दर है अपनी भारतीय संस्कृति उस पर गर्व करें।

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

कभी थे अकेले हुए आज इतने

KABHI-THE-AKELE



कभी थे अकेले हुए आज इतने 
नहीं तब डरे तो भला अब डरेंगे

विरोधों के सागर में चट्टान है हम
जो टकराएंगे हमसे मौत अपनी मरेंगे

लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगा
कदम बढ़ रहा है कभी न रूकेगा

न सूरज के सम्मुख अंधेरा टिकेगा
निडर है सभी हम अमर है सभी 

के सर पर हमारे वरदहस्त करता
गगन में लहराता है भगवा हमारा

रविवार, 15 मार्च 2020

क्या है हिन्दू राष्ट्र What is Hindu Nation


https://2charaiveticharaiveti.blogspot.com/2020/03/HINDU-RASHTRA-HINDU-DHARMA-RAJYA.html


हिन्दू राष्ट्र  , हिन्दू राष्ट्र , हिन्दू राष्ट्र

हर तरफ हो हल्ला हो रहा कि हिन्दू राष्ट्र
लेकिन क्या है ये हिन्दू राष्ट्र का मसला
क्या भारत को हिन्दू राष्ट्र को बनाना है , क्या भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करना है.
आप के ऐसे बहुत से सवालों के जवाब है इस लेख में

मैं शुरूआत करता हूँ 1 से 7 मई 1977 ई.  साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपे एक किस्से से जामा मस्जिद के शाही इमाम सैय्यद अब्दुल्ला बुखारी जब मक्का गये तो वहाँ के निवासी ने उनसे पूछा - ‘ आप हिन्दू हैं ? ’ शाही इमाम ने चौक कर कहा - ‘ नहीं , नहीं मैं मुसलमान हूँ। ’ बाद में उन्होंने प्रश्नकर्ता से पूछा कि , ‘ आपने मुझे हिन्दू क्यों कहा ? ’ तो उसका सहज उत्तर था, ‘ इसलिए कि आप हिन्दुस्थान से आये हैं।’

ऐसे ही एक भारतीय से एक फ्रांसीसी ने पूछा कि , ‘‘ आपका मजहब क्या है?’’ उसने उत्तर दिया , ‘हिन्दू’ । फ्रांसीसी ने कहा , ‘ वह तो आपकी राष्ट्रीयता है। आपका मजहब क्या है ? ’

हिन्दू - इस देश के निवासी का नाम

न अरब निवासियों को और न ही फ्रांसीसियों या अन्य देश को इस बारे में कोई भ्रम है कि हिन्दू इस देश की राष्ट्रीयता का नाम है । जो भी इस देश का राष्ट्रीय है वह हिन्दू है, भले ही उपासना की दृष्टि से वह शैव, सिख, शाक्त , मुसलमान , ईसाई , बौद्ध , यहूदी , पारसी क्यों न हो । इस बात को न्यायमूर्ति मोहम्मद करीम छागला ने इन शब्दों में कहा है - ‘ फ्रांसीसी अपनी तर्क और यथार्थ बुद्धि के आधार पर समस्त भारतीयों को , फिर वे किसी भी जाति या समाज के क्यों न हों, ‘हिन्दू ’ कहते हैं। मुझे लगता है कि यह उन सब लोगों का बिल्कुल सही वर्णन है जो इस देश में रहते हैं और इसे अपना घर मानते हैं। सच्चे अर्थाें में हम सब हिन्दू हैं, हालाँकि हम अलग - अलग मजहबों को मानते हैं। मैं हिन्दू हूँ क्योंकि मैं आर्याें से अपनी परम्परा को मानता हूँ जो पीढ़ी दर पीढ़ी उत्तराधिकार के रूप में हमें प्राप्त हुई है। यदि हम सब इस तथ्य को ही स्वीकार कर लें और वंश के नाते अपने आपको हिन्दू कहने लगें तो यह सेक्युलरवाद की सबसे बड़ी विजय होगी।

फिर भी भ्रम

किन्तु दूसरी ओर ऐसे राजनैतिक नेताओं की कमी नहीं है जो हिन्दू राष्ट्र के विचार को घोर साम्प्रदायिक और सेक्युलररिज्म के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हैं, यद्यपि यह भी सत्य है कि उनका यह कथन किसी न किसी राजनैतिक हेतु से प्रेरित रहता है।
लोकनायक जयप्रकाश यह कहते थे कि बंगलादेश और पाकिस्तान मिलाकर हम एक राष्ट्र है। हमारे राज्य अलग - अलग हो सकते हैं किन्तु राष्ट्रीयता हमारी एक है - भारतीय.
लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष कलीमुद्दीन शम्स यह कहते थे कि मुसलमान इस देश में अलग राष्ट्र है। और शम्स साहब ही नहीं आज भी औवेशी जैसे कई यह कहते पाये जाते हैं। यह सब सुनकर इस देश के लोगों में राष्ट्र , राज्य , हिन्दू , सेक्युलर आदि के सम्बन्ध में एक गहरा भ्रम उत्पन्न हो जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । और इस भ्रम को और अधिक बढ़ाने में कुछ बड़े - बड़े राजनैतिक नेता भी लगे हुए हैं. क्योंकि ऐसा करने से उनके वोट पकते हैं और उनकी कुर्सी सुरक्षित रहने की संभावना बढ़ जाती है। हानि अगर पहुँचती है तो हमारी राष्ट्रीय एकता को , आपसी सद्भाव को , मिलजुलकर काम करने के अपने राष्ट्रीय संकल्प को । पर कुर्सी के मोह के आगे इन राजनीतिज्ञों को उसकी क्या चिंता ?

लेकिन जो राष्ट्रभक्त है वो इस राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति चाहते हैं , इस देश को दुनिया का सबसे श्रेष्ठ देश बनाना चाहते हैं, वे इस प्रश्न का गहराई से विचार किये बिना नहीं रह सकते , क्योंकि यदि विचार स्पष्ट न हो, मार्ग साफ न हो , लक्ष्य स्थिर न हो और मन मिले हुए न हों तो कदम ठिठकेंगे, गति धीमी होगी, भटकने की सम्भावना बढ़ेगी। अतः गहराई से विचार जरूरी है।

हिन्दू- राष्ट्र -hindu-dharma-

हिन्दु राष्ट्र - एक अनादि अखण्ड प्रवाह


और इस आध्यात्कि चेतना का सर्वाधिक आविष्कार जहाँ की राष्ट्रीयता में हुआ है वह हिन्दू राष्ट्र इतिहास के प्रथम पन्ने पर ही एक पूर्ण विकसित राष्ट्र के रूप में झलकता हुआ हमें दिखता है । सबसे बड़े सेक्युलरवादी कहे जाने वाले पं. जवाहरलाल नेहरू ने ग्लिम्प्सेस आॅफ वल्र्ड हिस्ट्री में यह कहते हुए गौरव का अनुभव किया है कि ‘ इतिहास के उषाकाल से लेकर सीधे हमारे युग तक भारतीय सभ्यता और संस्कृति की विशाल और अविच्छिन्न धारा को देखकर कौतूहल होता है, विस्मित होना पड़ा है।’ मातृभूमि के प्रति उत्कट आत्मीयता का भाव वैदिक काल में ‘माता इयं , पुत्रो अहम् पृथिव्याः’ अर्थात् ये धरती हमारी माता है और हम इसके पुत्र है में प्रकट हो जाता है।

पुराण कहते हैं -       
                    ‘ उत्तरं यत् समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
                                  वर्षंतद् भारतं नाम भारती यत्र संतति।।

मे अभिव्यक्त होकर मध्ययुग में बार्हस्पत्य शास्त्र के इस श्लोक में प्रकट होता है -

                                ‘ हिमालयात् समारभ्य यावदेन्दु सरोवरम्
                                  तद् देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।

प्रसंगवशात् यह श्लोक ‘हिन्दू’ शब्द की व्युत्पत्ति का भी संकेत देता है जिसके अनुसार हिमालय का ‘हि’ और इन्दुसरोवर का ‘न्दु’ मिलकर ‘हिन्दू’ बना है जबकि एक मान्यता के अनुसार वह ‘सिन्धु’ का अपभ्रंश है जो पहले सिन्धु के आसपास के प्रदेशों में रहने वालों के लिए प्रयुक्त होकर कालान्तर में इस पूरे देश के निवासियों के लिए प्रयुक्त हो गया। दोनांे स्थितियों में ‘हिन्दू’ इस धरती के बेटों के लिए प्रयुक्त हुआ है इसमें कोई सन्देह नहीं।

     राष्ट्रीयता के अनिवार्य घटक के रूप में मातृभूमि के प्रति भावात्मक सम्बन्ध की यह परम्परा ही नहीं, प्रत्यक्ष राष्ट्रदेव के साक्षात्कार का प्रमाण भी हमें अथर्ववेद इस वैदिक श्लोक में प्राप्त होता है -

                                    भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विदः तपोदीक्षामुदासेदुरग्रे।
                               ततो राष्ट्रं बलमोजश्र्व जातं तदस्मे देवा उपसन्नमन्तु।।

अर्थात् लोक कल्याण की इच्छा से प्रेरित होकर ऋषियों ने उग्र तपश्चर्या की जिससे बल और ओज से युक्त राष्ट्र का जन्म हुआ। अतः इस राष्ट्र-देवता की उपासना करें।


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हिन्दू नाम ही क्यों ?


राष्ट्र जीवन का यह अखंड प्रवाह जो पहले भारत नाम से जाना गया वही अर्वाचीन काल में हिन्दू नाम से प्रसिद्ध हुआ। जैसे गंगा का पावन प्रवाह भागीरथी , जाहनवी , हुगली आदि विभिन्न नाम धारण करता हुआ भी वही बना रहा और अपने प्रगतिपथ में अन्य अनेकों प्रवाहों को सम्मिलित करता हुआ और अधिक समृद्ध होता गया वैसे ही  हिन्दुराष्ट्र जीवन का प्रवाह अनेक नाम धारण करने पर भी एक ही जीवनधारा को इंगित करता रहा और अपने विकास क्रम में अनेकां प्रवाहों एवं प्रभावों को आत्मसात् करते हुए व उनसे समृद्ध होते हुए आज तक चला आया है। हिन्दू की जगह भारतीय कह देने से इस देश की राष्ट्रीयता का आशय नहीं बदलता । अतः ऐसे सुझाव देने वाले कि हिन्दू राष्ट्र की जगह भारतीय राष्ट्र कहना चाहिए यदि यह मानते हों कि ऐसा कहने से वे किसी अधिक उदात्त अवधारणा को प्रस्तुत कर रहे हैं, तो यह उनकी भूल है। आज दुष्प्रचार की आँधी में ‘हिन्दू’ शब्द को छोड़ने का अर्थ है अंग्रेजों की उस कुटिल नीति के हाथों पराजय स्वीकार करना जिसने ‘हिन्दू’ शब्द को केवल सम्प्रदायवादी बताकर उसके अर्थ का अनर्थ किया। यह स्वामी विवेकानन्द , महायोगी अरविन्द व लोकमान्य तिलक का अपमान होगा जिन्होंने स्पष्ट एवं असंदिग्ध शब्दों में इस राष्ट्र को हिन्दू राष्ट्र कहा। यह उन महात्मा गांधी को साम्प्रदायिकता की श्रेणी में बैठाना होगा जिन्होंने डंके की चोट पर कहा कि हिन्दुत्व सत्य की अनवरत खोज का ही दूसरा नाम है और यदि आज यह प्रयास कुण्ठित, निष्क्रिय और विकास के प्रति असंवेदनशील हो गया तो इसका कारण यह है कि हम थक गये है। ज्यों ही यह थकावट दूर होगी , हिन्दुत्व ऐसी समुज्ज्वल प्रभा से सम्पूर्ण विश्व में प्रस्फुटित होगा, जैसा शायद इसके पहले कभी नहीं हुआ।

हिन्दू राष्ट्र जीवन के प्रमुख सूत्र


जिस सांस्कृतिक आधार पर इस अति प्राचीन राष्ट्र की राष्ट्रीयता का भवन खड़ा किया गया है उसका प्रमुख सूत्र है ‘ विविधता में एकता’ । हिन्दू विचार ने इस तथ्य को स्वीकार किया कि इस जगत् में प्रत्येक अस्तित्व की अपनी विशिष्ट भूमिका है और सृष्टि के विकासक्रम में उसका योगदान देने के लिए पूर्ण अवसर प्रदान करना जहाँ आवश्यक है , वहाँ इस सब विविधता में विद्यमान मूलभूत एकता की अनुभूति कराकर सबको एकता के सूत्र में पिरोना भी जरूरी है । इसलिए सब प्रकार की प्रवृत्तियों , गुणवत्ताओं, भावनाओं व क्षमताओं वाले लोगों को राष्ट्रजीवन में योग्य स्थान देते हुए समाज जीवन के लिए पोषक प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देने की ओर , हानिकारक प्रवृत्तियों को नियन्त्रित करने की ओर ध्यान दिया गया।

‘सृष्टि में कहीं विरोध नहीं है , सर्वत्र समन्वय है, क्योंकि सब कुछ एक ही सत्य तत्व का विस्तार है।’ इस अनुभूति में ऐसी ही व्यवस्थाएँ देने पर बल दिया गया जो विरोध पर नहीं , समन्वय पर आधारित हों। पश्चिमी सभ्यता की तरह हमारे यहाँ व्यक्ति , परिवार , समाज , राष्ट्र व विश्व को समकेन्द्रित वृतों के समान एक का विकास दूसरे असम्बद्ध और हित विरोधी न मानकर कुन्तल के समान एक का विकास दूसरे में माना गया।

व्यक्ति की आत्मा ही परिवार, समाज व राष्ट्र की सीढ़ियां चढ़ती हुई विश्वात्मा बनने की ओर अग्रसर होती है। प्रगति की इस दशा में मनुष्य को बढ़ना ही हमारे यहाँ की समस्त रचनाओं का लक्ष्य रहा है, भले ही अज्ञान में पड़कर हमने उन्हें विकृत क्यों न कर दिया हो।
सत्य एक होते हुए भी मनुष्य अपनी सीमित क्षमता के कारण उसका सर्वांश में आकलन नहीं कर सकता , उसके एक अंश का ही अनुभव कर सकता है। इसलिए सत्य की उसकी अनुभूति अन्यों की अनुभूति से यों भिन्न हो सकती है ‘ एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति। ’ अर्थात् सत्य एक है पर विद्वान उसे भिन्न - भिन्न ढंग से प्रकट करते हैं। किन्तु केवल अपनी अनुभूति को ही सत्य और अन्यों की अनुभूतियों को असत्य कहना हमारे यहाँ गलत माना गया।
माना यही गया कि स्वयं की अनुभूति को सत्य मानने का पूरा अधिकार होते हुए भी अन्यों की अनुभूतियों को भी सत्य का ही दूसरा पहलू मानकर उनका समादर करना चाहिए । इसी में से सर्वमत समादर का तत्व निकला जो हमारे राष्ट्रजीवन का एक अति उज्ज्वल व्यवहार तत्व है।
हिन्दू राज्य भी ऐसे थे

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि राजतंत्र बदलते रहने पर भी राष्ट्र नहीं बदलता तथा वही राज्यतंत्र देश की प्रगति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है जो राष्ट्रमानस के अनुकूल हो । राजतंत्र का स्वरूप एकतांत्रिक , लोकतांत्रिक , सम्प्रदाय - सापेक्ष , सम्प्रदाय - निरपेक्ष आदि अनेक प्रकार का हो सकता है। हिन्दू राष्ट्र की प्रकृति के अनुरूप लोकतांत्रिक और सम्प्रदाय निरपेक्ष राज्य - पद्धति ही सर्वाधिक उपयुक्त है। प्राचीन काल में राजतंत्र या गणतंत्र कोई भी व्यवस्था राज्यों की क्यों न रही हो - सम्प्रदाय निरपेक्षता उनका अनिवार्य लक्षण रहा है। राज्य का कोई एक सम्प्रदाय का प्रचार करना हिन्दुओं के राज्य - सिद्धान्तों के विपरीत रहा है और भारत के हिन्दू राज्यों का इतिहास सम्प्रदाय निरपेक्ष राज्य-व्यवस्था का जीता-जागता प्रमाण है। विजयनगर के हिन्दू राज्य अथवा पंजाब के सिख वीरों के राज्य में मुसलमानों को पूरी स्वतन्त्रता को पूरी स्वतंत्रता व समानता प्राप्त थी। छत्रपति शिवाजी की हिन्दू पदपादशाही में भी मुसलमानों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। कट्टर मुस्लिम इतिहासकारों ने भी इस बात की प्रशंसा की है कि किस प्रकार अत्यन्त आदर भाव रखते थे और इस बात का पूरा ध्यान रखते थे कि मुस्लिम बच्चों व वृद्धों पर कोई हाथ न उठाये । और यह सब उस समय जब इससे बिल्कुल उल्टा व्यवहार मुस्लिम बादशाहों द्वारा हिन्दुओं के साथ किया जाता था।

हिन्दू -राष्ट्र-हिन्दू-धर्म

राष्ट्रीयता से आगे


हिन्दू राज्य कभी सम्प्रदाय - सापेक्ष नहीं रहा क्योंकि सम्प्रदाय सापेक्ष राज्य का अर्थ है धर्मगुरूओं द्वारा साम्प्रदायिक कानूनों के आधार पर चलाया जाने वाला राज्य । रोम के पोप और इस्लाम के खलीफाओं के समान राज्य चलाने की व्यवस्था हिन्दुस्थान में कभी नहीं रही। ऐसा होते हुए भी यह कहना कि हिन्दु राष्ट्र , जिसकी अस्मिता उदात्त जीवनमूल्यों के आधार पर सिद्ध हुई है सम्प्रदाय - निरपेक्ष राज्य व्यवस्था का विरोध करेगा , अपना अज्ञान प्रगट करना ही है। सम्प्रदाय - निरपेक्ष व्यवस्था के विरोध की बात तो दूर , हिन्दुराष्ट्र - जीवन के उदात्त तत्व जो आज उन राष्ट्रों का भी मार्गदर्शन कर सकते है जो दुनिया की सिकुड़ती दूरियों के बीच इस तीव्र आर्थिक और वैज्ञानिक प्रतियोगिता के युग में अपनी जीवनावश्यकताओं की पूर्ति के लिए और अधिक व्यापक सहयोग के लिए बाध्य हुए हैं। यदि आज के राष्ट्रसमूह कल के विश्व प्रशासन की पूर्व भूमिका है और यदि विविधता को बलात् एकरूपता लादकर नष्ट नहीं करना है और प्रत्येक राष्ट्र को सम्मान के साथ अपनी भूमिका निभाने की स्वतंत्रता देना है तो उसके लिए हिन्दु राष्ट्र जीवन को छोड़कर और कौन सा तात्विक आधार व अनुकरणीय उदाहरण प्राप्त होगा?









सोमवार, 9 मार्च 2020

Swami Vivekananda biography - 1

Swami Vivekananda

स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता के सिमला क्षेत्र के प्रसिद्ध दत्त परिवार में हुआ था। उसके पिता श्री विश्वनाथ दत्त वकील थे। उन्होंने कई विषयों का अध्ययन किया था एवं सभी उनका समुचित सम्मान करते थे। उनकी पत्नी श्रीमती भुवनेश्वरी देवी थीं। वे दिखने एवं व्यवहार में एक रानी के समान गरिमामयी थीं। सभी उन्हें स्नेह एवं आदर करते थे।

12 जनवरी 1863 ई. को उन्होंने प्रथम पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम रखा गया - नरेन्द्रनाथ।

नरेन बड़ा नटखट बालक था, और कभी - कभी भुवनेश्वरी देवी उसे सम्भालने में असमर्थ हो जाती। परन्तु उन्होंने यह देखा कि जब नरेन्द्र अत्याधिक चंचल हो जाता, तो यदि उसके सिर पर ठण्डा पानी डालते हुए उसके कान में शिव का नाम सुनाया जाए, तो वह एकदम शान्त हो जाया करता । इसीलिए , अनेकों बार उसे नियन्त्रण में लाने के लिए वे इस युक्ति का इस्तेमाल किया करती थीं। 

बालक नरेन्द्र ने अपनी माता से बहुत - सी बातें सीखी थीं, और उनकी माता उसे महाभारत तथा रामायण से अनेकों कहानियाँ सुनाया करती थीं। नरेन्द्र को राम - विषयक कहानियाँ सुनना बहुत अच्छा लगता था। उसने राम - सीता की मिट्टी की एक युगल - मूर्ति खरीदी और फूलों से उसकी पूजा करनी शुरू कर दी । एक बार वह केले के उद्यान में इस उम्मीद में बहुत समय तक बैठा रहा कि उसे हनुमान जी के दर्शन प्राप्त होंगे क्योंकि उसने कहीं सुन रखा था कि राम के इस वीर भक्त को ऐसा स्थान अत्यन्त प्रिय है। उन्हें ध्यान में मग्न होनेवाला खेल भी प्रिय था। वह अपने दो - एक संगियों को अपने साथ किसी एकान्त स्थान में ले जाता और वे लोग सीता - राम या शिव की मूर्ति के सामने बैठ जाते । तब नरेन्द्र ध्यान करने बैठ जाता और भगवान का चिन्तन करता।

 वह ईश्वर के ध्यान में मग्न हो जाता और उस समय अपने आसपास कुछ भी अनुभव नहीं कर पाता। एक बार एक नाग सरकते हुए वहाँ आ पहुँचा । अन्य बालक भाग खड़े हुए, परन्तु नरेन्द्र वहीं बैठा रहा । उन्होंने बहुत बार उसे पुकारा , परन्तु नरेन्द्र ने कुछ न सुना। कुछ देर बाद नाग वहाँ से चला गया। बाद में जब उसके माता  - पिता ने नरेन्द्र से पूछा कि वह वहाँ क्यों नहीं , तो उसने कहा , ‘‘ मैं नाग के बारे में कुछ भी जान न पाया। मैं तो आनन्द में था।’’ 

जब कोई साधु नरेन्द्र के घर आते तो वह बड़ा प्रसन्न होता था। कभी- कभी तो वह उन्हें किमती चीजें तक दे डालता था। एक बार उसने अपना पहना हुआ नया कपड़ा ही एक साधु को दे दिया। इस घटना के बाद जब भी कोई साधु उनके घर में आता, तो नरेन्द्र को एक कमरे में बन्द कर दिया जाता था। परन्तु यदि नरेन्द्र उस समय किसी साधु को देख पाता तो खिड़की से ही चीजें फेंक दिया करता। कभी - कभी तो वह कह उठता कि किसी दिन वह भी साधु बन जाएगा।

जैसा हमने पहले ही कहा है, नरेन्द्र के पिताजी एक वकील थे । बहुत से लोग उनसे मिलने आया करते थे। वे उन सबका आतिथ्य करते एवं हुक्का पीने के लिए दिया करते । बैठकखाने में विभिन्न जाति के लोगों के लिए अलग - अलग हुक्कों की व्यवस्था थी। परन्तु जातिभेद नरेन्द्र के लिए एक बड़ा रहस्य था। क्यों एक जाति के सदस्य को अन्य जाति नरेन्द्र के लिए एक बड़ा रहस्य था। क्यों एक जाति के सदस्य को अन्य जाति के सदस्यों के साथ भोजन करने नहीं दिया जाता ? क्यों विभिन्न जातियों के लिए अलग - अलग हुक्कों की व्यवस्था की गई थी।

 क्या होगा यदि वह सभी हुक्कों से धुम्रपान करे? क्या कोई धमाका होगा? या छत नीचे गिर पड़ेगी? नरेन्द्र ने स्वयं ही इसका पता लगाने कि निश्चय किया। उसने एक हुक्के से एक कश लगाया। कुछ भी तो नहीं हुआ। इस प्रकार एक के बाद एक सभी हुक्कों से कश लगाया। फिर भी नहीं हुआ। उसी वक्त उसके पिताजी ने उस कक्ष में प्रवेश किया और पूछा कि वह क्या कर रहा है। नरेन ने उत्तर दिया , ‘‘ पिताजी मैं देख रहा था कि यदि मैंने इस तरह जाति तोड़ी, तो आखिर होगा क्या? ’’ उसके पिताजी ने एक ठहाका लगाया और अपने अध्ययन कक्ष में चले गए।
Swami Vivekananda biography

जब नरेन्द्र छह वर्ष का हुआ तो उसका पढ़ना शुरू हुआ पहले - पहल वह पाठशाला में नहीं गया था क्योंकि उसके पिताजी ने उसके लिए एक शिक्षक नियुक्त कर दिया था। जब सात वर्ष का हुआ तो उसे मेट्रोपोलिटन संस्था में दाखिल करवाया गया। इस संस्था के संस्थापक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर थे। नरेन्द्र नाथ एक अत्यन्त मेधावी छात्र था और अकस्मात् ही पाठ को याद कर लिया करता था। वह बालकों का नेता बन गया। खेल में उसकी बहुत रूचि थी। दोपहर भोजन समाप्त कर वह सबसे पहले खेल के मैदान में पहुँच जाता । कूदना , दौड़ना , मुक्केबाजी तथा काँच की गोलियों से खेलना आदि में उसकी विशेष रूचि थी। वह कुछ खेलों का आविष्कार भी कर लिया करता था। 

नरेन को पशुओं से भी बड़ी प्रीति थी तथा वह घर की गाय से भी खेला करता । उसने कुछ पालतू जानवर और पंक्षियों को भी पाल रखा था। इनमें एक - एक बन्दर , बकरी और मोर , कुछ कबूतर तथा दो या तीन गिनी - पिग थे। 
Swami Vivekananda

जैसे - जैसे नरेन्द्र बड़ा होने लगा वह खेलने के बजाय पुस्तकें पढ़ने में अधिक रूचि लेने लगा। एक वर्ष के लिए वह प्रेसिडेन्सी काॅलेज में पढ़ने  के लिए दाखिल हुआ, उसके दूसरे वर्ष वह जनरल असेम्बली की संस्था में दाखिल हुआ, जिसे आजकल स्काॅटिश चर्च काॅलेज कहा जाता है। इस काॅलेज के अध्यापकगण नरेन्द्र की बुद्धिमत्ता देखकर चमत्कृत हो जाते थे। प्रधानाध्यापक श्री विलियम हेस्टी ने कहा था कि नरेन के समान प्रतिभाशाली छात्र उन्होंने आज तक नहीं देखा । नरेन बहुत पढ़ाई करता था तथा विभिन्न विषयों पर अनेकों पुस्तकें पढ़ा करता था। उसने 1881 ई. में बी.ए. (प्रथम) की परीक्षा उत्तीर्ण कर 1884 ई. में बी.ए. की डिग्री प्राप्त की।

नरेन्द्र ने चार या पाँच वर्षों तक संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की थी। उसने अनेक प्रकार के वाद्य - यन्त्रों को बजाना भी सीख लिया था तथा एक उत्कृष्ट गायक के रूप में उसकी ख्याति भी हुई थी।

इसी समय नरेन धर्म - विषयक समस्याओं में विशेष रूचि लेने लगे। अन्य नवयुवकों की भाँति नरेन्द्र भी ब्रह्मसमाज का सदस्य बन गया तथा श्री केशवचन्द्र सेन की वकृताओं को सुनने लगा। परन्तु एक प्रश्न उसे सदा कष्ट पहुँचाता कि ईश्वर का कोई अस्तित्व भी है या नहीं अथवा क्या किसी ने आज तक उसे देखा भी है। इस प्रश्न के उचित समाधान हेतु वह अनेक धार्मिक नेताओं के समक्ष गया जिसमें श्री देवेन्द्रनाथ टैगोर भी थे। परन्तु कोई भी उसकी शंकाओं का समाधान नहीं कर सका।

प. पू. डाॅ. हेडगेवार जी के विचार

हमारा  कार्य सम्पूर्ण समाज के लिए होने के कारण , उसके किसी भी अंग की उपेझा करने से काम नहीं चलेगा। समस्त हिन्दू बांधवों से फिर वे किसी भी श्...