शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

प. पू. डाॅ. हेडगेवार जी के विचार

हमारा  कार्य सम्पूर्ण समाज के लिए होने के कारण , उसके किसी भी अंग की उपेझा करने से काम नहीं चलेगा। समस्त हिन्दू बांधवों से फिर वे किसी भी श्रेणी में क्यों न हों , हमारा व्यवहार समान रूप से प्रेम का होना चाहिये । किसी भी हिन्दू बन्धू को निम्न समझकर दुत्काना महापाप है। 

                                                                         प. पू. डाॅ. हेडगेवार 

रविवार, 9 जून 2024

मौत से ठन गयी - अटल बिहारी वाजपेयी जी

 ठन गई !

मौत से ठन गई !

झुझने का कोई इरादा न था , 

मोड पर मिलेगे इसका वादा न था 

रास्ता रोक कर वो खड़ी हो गई ,

यों लगा जिंदगी से बड़ी हो गयी 

मौत की उमर क्या है ? दो पल भी नहीं ,

जिंदगी सिलसिला, आजकल की नही 

मैं जी भर जिया , मैं मन से मरूँ ,

लौटकर आऊँगा , कूच से क्यूँ डरु ?

तू दबे पाओं, चोरी छिपे से ना आ 

सामने वार कर फिर मुझे आज़मा

मौत से बेख़बर, ज़िंदगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी है कोई गिला

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,

आँधियों में जलाए हैं बुझते दिए

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई,

मौत से ठन गई।

......... अटल बिहारी जी



श्री माधवराव गोलवलकर ( गुरुजी )

 *******श्री गुरु जी *******

                  (5 जून,1973/ पुण्य-तिथि)

                  संघ के संस्थापक परम् पूजनीय डा. हेडगेवार जी ने अपने देहान्त से पूर्व जिनके समर्थ कन्धों पर संघ का भार सौंपा, वे थे श्री माधवराव गोलवलकर, जिन्हें सब प्रेम से श्री गुरुजी कहकर पुकारते हैं। आज उनकी 48 वीं पुण्य-तिथि है|

                  श्रीगुरुजी का जन्म 19 फरवरी, 1906 (विजया एकादशी) को नागपुर में अपने मामा के घर हुआ था। उनके पिता श्री सदाशिव गोलवलकर उन दिनों नागपुर से 70 कि.मी. दूर रामटेक में अध्यापक थे।

                    माधव बचपन से ही अत्यधिक मेधावी छात्र थे। उन्होंने सभी परीक्षाएँ सदा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। कक्षा में हर प्रश्न का उत्तर वे सबसे पहले दे देते थे। अतः उन पर यह प्रतिबन्ध लगा दिया गया कि जब कोई अन्य छात्र उत्तर नहीं दे पायेगा, तब ही वह बोलेंगे |

                  उच्च शिक्षा के लिए काशी जाने पर उनका सम्पर्क संघ से हुआ। वे नियमित रूप से शाखा पर जाने लगे। जब डा. हेडगेवार जी काशी आये, तो उनसे वार्तालाप में माधव का संघ के प्रति विश्वास और दृढ़ हो गया। एम-एस.सी. करने के बाद वे शोधकार्य के लिए मद्रास गये; पर वहाँ का मौसम अनुकूल न आने के कारण वे काशी विश्वविद्यालय में ही प्राध्यापक बन गये। 

                   उनके मधुर व्यवहार तथा पढ़ाने की अद्भुत शैली के कारण सब उन्हें ‘गुरुजी’ कहने लगे और फिर तो यही नाम उनकी पहचान बन गया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक मालवीय जी भी उनसे बहुत प्रेम करते थे। कुछ समय काशी रहकर वे नागपुर आ गये और कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन दिनों उनका सम्पर्क रामकृष्ण मिशन से भी हुआ और वे एक दिन चुपचाप बंगाल के सारगाछी आश्रम चले गये। वहाँ उन्होंने विवेकानन्द के गुरुभाई स्वामी अखंडानन्द जी से दीक्षा ली। 

                  स्वामी जी के देहान्त के बाद वे नागपुर लौट आये तथा फिर पूरी शक्ति से संघ कार्य में लग गये। उनकी योग्यता देखकर डा. हेडगेवार जी ने उन्हें 1939 में सरकार्यवाह का दायित्व दिया। अब पूरे देश में उनका प्रवास होने लगा। 21 जून, 1940 को डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद श्री गुरुजी सरसंघचालक बने। उन्होंने संघ कार्य को गति देने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। 

                     1947 में देश आजाद हुआ; पर उसे विभाजन का दंश भी झेलना पड़ा। 1948 में गांधी जी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। श्री गुरुजी को जेल में डाल दिया गया; पर उन्होंने धैर्य से सब समस्याओं को झेला और संघ तथा देश को सही दिशा दी। इससे सब ओर उनकी ख्याति फैल गयी। संघ-कार्य भी देश के हर जिले में पहुँच गया।

                  श्री गुरुजी का धर्मग्रन्थों एवं हिन्दू दर्शन पर इतना अधिकार था कि एक बार शंकराचार्य पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया गया था; पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार कर दिया। 1970 में वे कैंसर से पीड़ित हो गये। शल्य चिकित्सा से कुछ लाभ तो हुआ; पर पूरी तरह नहीं। इसके बाद भी वे प्रवास करते रहे; पर शरीर का अपना कुछ धर्म होता है। उसे निभाते हुए श्री गुरुजी ने 5 जून,1973 को रात्रि में शरीर छोड़ दिया।

                  श्रीगुरुजी, अपनी विचार शक्ति व कार्यशक्ति से विभिन्न क्षेत्रों एवम् संघटनाओं के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत बनें। श्रीगुरुजी का जीवन अलौकिक था, राष्ट्रजीवन के विभिन्न पहलुओं पर उन्होंने मूलभुत एवम् क्रियाशील मार्गदर्शन किया। “सचमुच ही श्रीगुरूजी का जीवन ऋषि-समान था।

शनिवार, 31 दिसंबर 2022

लो श्रद्धांजली राष्ट्र पुरुष , शत कोटी हृदय के कंज खिले है


लो श्रद्धांजली राष्ट्र पुरुष , शत कोटी हृदय के कंज खिले है |

आज तुम्हारी पूजा करने ,सेतु हिमालय संग मिले ||


माँ के पद पद्मों तुमने जो अमूल्य उपहार रखा है |

सत्य चिरंतन अक्षय है , हिन्दू की अमिट रूपरेखा है || 

पावन संस्कारों से निर्मित , तन मन ये अभेद्य किले |

आज तुम्हारी पूजा करने ..........................................

तुमने किया व्यतीत कठिनतम , लोक - प्रसिद्ध - परामुख जीवन |

भीष्म समान रहे तुम अविचल , हिन्दू राष्ट्र के हित जीवन ,

देव ! तुम्हारी घोर  तपस्या के ही  ये सुफल मिले है ||

 आज तुम्हारी पूजा करने ----------------------------------

तुम अजात और लोक संग्रही , संघ शक्ति के वलय कोण थे ,

देव ! बता दो प्रतिपक्षी भी क्यों इतने संतुष्ट मौन थे , 

सुनकर पावन चरित तुम्हारा  कोटी हृदय प्रस्तर पिघले है ||

 आज तुम्हारी पूजा करने ----------------------------------

आज तुम्हारी पार्थिव प्रतिमा चर्म चक्षुओ से अद्रश्य है ,

किन्तु कोटी उर निलयों में तब दिव्य मूर्ति प्रस्थित अखंड है ,

तेजोमय प्रतिबिंब तुम्हारे , स्वयं सिद्ध अगणित निकले है ||

आज तुम्हारी पूजा करने --------------------------------------




सोमवार, 26 दिसंबर 2022

जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान हैं

जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान हैं | 
इसके वास्ते ये तन हैं , मन हैं , प्राण हैं ||धु||

इसके कण कण में लिखा रामकृष्ण नाम है |
हुतात्माओं के रुधिर में भूमि शस्य श्याम हैं ||
धर्म का ये धाम है , सदा इसे प्रणाम है | 
स्वतंत्र है यह धरा स्वतंत्र आसमान है || 1||

इसकी आन पर अगर बात कोई आ पड़े | 
इसके सामने जुल्म के पहाड़ हो खड़े ||
शत्रु सब जहां हो विरुद्ध आसमान हो |
मुक़ाबला करेंगे जब तक जान में जान हो ||2|| 

इसकी गोद में हजारों गंगा , यमुना झूमती |
इसके पर्वतों की चोटियाँ गगन को चूमती ||
भूमि ये महान है निराली इसकी शान है | 
इसकी जय पताका पर लिखा विजय निशान है ||3|| 

जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है |
इसके वास्ते ये तन है , मन है , प्राण है ||

बुधवार, 21 दिसंबर 2022

परिवर्तन के संवाहक - 1 बाल विवाह निरस्त कराने वाली कृति बनीं बदलाव की वाहक

अब बालिका वधु नहीं - देश में पहली बार बाल विवाह निरस्त कराने का श्रेय मिला राष्ट्रीय स्वयं सिद्ध सम्मान 

 डॉ. कृति भारती के प्रयासों से पहली बार हुआ जब कोई बाल विवाह निरस्त कर दिया गया | राजस्थान में बाल विवाह निरस्त कराने और रोकथाम की मुहिम के लिए सारथी ट्रस्ट की प्रमुख डॉ. कृति को जिंदल फ़ाउंडेशन का राष्ट्रीय स्वयं सिद्ध सम्मान मिला | राजस्थान की जड़ों में घर की हुई बाल विवाह जैसी प्रथा को सामाजिक परिवेश में रहकर बदलने , बाल विवाह को निरस्त करवाने और ऐसे विवाहों पर कारगर लगाम लगाने की अनूठी और उतनी ही साहसिक मुहिम को अब राष्ट्रीय पहचान मिलने लगी है | अन्य राज्यों में भी सारथी ट्रस्ट की इस मुहिम से जुड़कर लोग इस कुरीति को बदलना चाहते है | राजस्थान में किए गये प्रयासों से अन्य को प्रेरणा मिल रही है | सारथी ट्रस्ट की मैनेजिंग ट्रस्टी डॉ कृति भारती पेशे से पुनर्वास मनोवैज्ञानिक हैं | 

परिवर्तन के संवाहक - 1 बाल विवाह निरस्त कराने वाली कृति बनीं बदलाव की वाहक 


बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के आधार पर डॉ कृति ने देश का पहला बाल विवाह निरस्त करवाकर अनूठी पहल की थी | उसी क्रम में आगे बड़ते हुये अनवरत 40 जोड़ों के बाल विवाह निरस्त करवाए और कई अन्य बाल विवाह होने से रुकवाए गए , 32 वर्षीय कृति बताती हैं की बाल विवाह को मिटाने की मुहिम को बड़ाते हुये उन्होने बचपन में बहुत संघर्ष झेले और अब भी अविवाहित हैं | कहती हैं , कई बालिका बधूओं को संरक्षण देकर महज मातृ धर्म का निर्वहन कर रही हूँ | समाज की जकड़ने को तोड़ने का काम आसान नहीं था , जान का जोखिम झेलने के अलावा कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता था | पिता ने मुझे और माँ का परित्याग किया था , जिसके बाद घटित हुये अन्य घटनाओं का बाल मन पर ऐसा असर हुआ की समाज की कुरीतियों के खिलाफ उठ खड़ी हुई | यहाँ तक कि सरनेम भी त्याग कर भारती कर लिया | 

"ऐसे बनी स्वयंसिद्ध ......................................"

देश में पहली बार बाल विवाह निरस्त कराने की राह खोज निकालने के साथ देश का पहला बाल विवाह निरस्त करवाने को लेकर जोधपुर के सारथी ट्रस्ट का नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड और वर्ल्ड रिकॉर्डस इंडिया में शामिल है | वर्ष 2016 में महज तीन दिन में दो बाल विवाह निरस्त करवाने पर इसे युनिक वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल किया गया | डॉ कृति भारती को बाल व महिला कल्याण पुनर्वास के क्षेत्र में साहसिक नवाचारों के लिए राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानों से नवाजा जा चुका है |

सोमवार, 19 दिसंबर 2022

युगों युगों से दुनिया चलती, जिसके दिव्य प्रकाश में YUGO YUGO SE DUNIYA CHALATI JISKE DIVYA PRAKASH MEN

युगों युगों से दुनिया चलती, जिसके दिव्य प्रकाश में 


 युगों युगों से दुनिया चलती, जिसके दिव्य प्रकाश में |

पुरुखों की वह पौरुष गाथा , अजर अमर इतिहास में ||

भारत के इतिहास में ----------------(1)

अपना बल ही अपना वैभव , कुरुक्षेत्र मैदानों में 

विजय लिखी थी खड़ग नौंक से , शक हुणी तूफानों में 

हार नहीं जय विजय पराक्रम , पुरुखों के पुरुषार्थ में ||

   भारत के इतिहास में -----------------(2)

राज्य सैकड़ो रहा विदेशी , पर अखंड यह परिपाटी 

मिटा मिटाने वाला उसको , तेजोमय इसकी माटी 

अमर - अमिट हिन्दू संस्कृति है , जल थल में आकाश में ||

      भारत के इतिहास में ----------------(3)

भौतिकता से त्रस्त विश्व की , एकमात्र भारत आशा 

परमानंद शांति की जननी , पूर्ण करेगी अभिलाषा 

यत्न संगठित बने मील के , पत्थर विश्व विकास में ||

     भारत के इतिहास में ---------------------(4)

व्यष्टि - समष्टि - सृष्टि जीवन में , कलिमल आहत मर्यादा 

हिन्दू संस्कृति संस्कारों से , दूर करेगी हर बाधा 

पतित पावनी संस्कृति गंगा , जन मन हृदयकाश में ||

भारत के इतिहास में --------------------(5)

शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

लक्ष्य शिखर की और अग्रसर भारत का पावन अभियान

                          

 

लक्ष्य शिखर की ओर अग्रसर , भारत का पावन अभियान 

लोकशक्ति के स्वप्नों पर अब , युवा शक्ति भी है गतिमान 

आओ तीव्र करे आह्वान , मिलकर सफल करें अभियान 

आओ तीव्र ..............................................................||


मातृभूमि का भाल सुरक्षित , जागा जनमानस विश्वास 

दानवता से मुक्ति हेतु ये , राष्ट्रभाव के सफल प्रयास 

भस्म करें आतंकवाद को , और तीव्र हो महाप्रयाण 

आओ तीव्र ........................................................||1||


जन्मभूमि प्रभु रामचन्द्र की , मुक्त हुई यह सुख की श्वास 

संस्कृति सूर्योदय पथ उज्जवल , होगा प्रबल जगी जनआस 

कर्म करें हम धर्माधारित , सक्रिय सभी लोक संस्थान |

आओ तीव्र ........................................................||2||


हो अपना हर भारतवासी , नहीं पराया या अंजान 

हम संतति हम भारत माँ की , करें राष्ट्र का हर उत्थान 

राष्ट्र समर्पण समझ हिताहित , कर पायेंगे जनकल्याण 

आओ तीव्र ........................................................||3||


प्रश्न अनेकों कदम निरंतर , एक अखंड राष्ट्र संदेश 

बड़ें परम वैभव के पथ पर , प्रगतिशील अपना परिवेश 

कर्म , ज्ञान और भक्ति धार कर , प्राप्त करें जग में सम्मान 

आओ तीव्र .......................................................॥ 4||


शनिवार, 19 सितंबर 2020

मौसमी पवन है मानसून Monsoon is the seasonal wind



 मानसून शब्द मूल रूप से अरबी भाषा के मौसिम से बना है, जिसका मतलब मौसम से हैं। मानसून शब्द का प्रयाग सबसे पले अरब सागर में चलने वाली उन हवाओं के लिए किया गया था, जो गर्मी में दक्षिण - पश्चिमी से और सर्दी में उत्तर पूर्व की ओर चलती है। इसके बाद संसार में उन सभी भागों की हवाओं को मानसून कहा जाने लगा, जिनकी दिशा में ऋतुवत बदलाव हो जाता है। मानसून का मतलब मौसम के मुताबिक हवाओं में होने वाला बदलाव है, जिसकी वजह से बरसात में भी बदलाव आता है। इस तरह मानसून धरातल पर चलने वाली वे हवाएं हैं , जो गर्मी और सर्दी की ऋतुओं को प्रवाह की दिशा बदल लेती है। हवाओं की दिशा बदलने की वजह वायुदाब में होने वाला बदलाव है और वायुदाब में बदलाव तापमान के बदलाव के साथ होता है। वायुदाब और तापमान में गहरा संबंध है । ताप बढ़ने पर वायु का आयतन बढ़ता है और यह फैलकर हल्का हो जाता है। इससे उसका दाब कम हो जाता है।


इसके विपरीत तापमान कम होने से वायु सघन हो जाती है और उसका दबाव बढ़ जाता है। पवनें हमेशा ज्यादा वायुदाब से कम वायुदाब की ओर प्रभावित होती है। यही संतुलन हमारे यहां  ग्रीष्मकालीन मानसून लाने में बड़ी भूमिका अदा करता है। 21 मार्च के बाद सूर्य उत्तरायण होने लगता है और 21 मार्च के बाद सूर्य उत्तरायण होने लगता है और 21 जून को यह कर्क रेखा पर लंबवत् होता है। इस दौरान बहुत ज्यादा सूर्यातप की वजह से एशिया में बैकाल झील और उत्तर - पश्चिमी पाकिस्तान में न्यून वायुदाब केन्द्र स्थापित हो जाते हैं। इसके विपरीत दक्षिणी हिन्द महासागर और उत्तर - पश्चिमी आॅस्ट्रेलिया के पास व जापान के दक्षिण में प्रशांत महासागर में उच्च दाब केन्द्र विकसित होते है। महासागरों में स्थित उच्च दाब केन्द्रों से स्थलीय निम्न दाब केन्द्र की ओर पवन चलने लगती है, जो आर्द्र होने के कारण वर्षा कराती है। इसके बाद 23 सितंबर से सूर्य दक्षिणायन होने लगता है और 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर लंबवत चमकता है, इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में पश्चिमी पाकिस्तान के पास उच्च दाब केन्द्र विकसित होते है। इस वजह से पवनें स्थल से सागर की ओर चलने लगती है। शुष्क होने के कारण ये वर्षा नहीं करा पाती । मध्य आंक्षाशों में चक्रवाती तूफान जाड़े के मानसून में कई बाधाएं खड़ी कर देते है । इन तूफानों के कारण कुछ वर्षा हो जाती है। 

इसके अलावा स्थल और जल के मध्य दैनिक तापमान की विषमता छोटे स्तर पर दैनिक मानसून उत्पन्न करती है, जिसे स्थल और समुद्र समीर कहा जाता है। सुबह व रात में ठंडी हवा स्थल से समुद्र की ओर चलती है। दिन में गर्मी के कारण स्थल ज्यादा गर्म हो जाता है , जिससे हवा गर्म हो जाती है व वायुदाब कम हो जाता है। इसकी वजह से हवा समुद्र से स्थल की ओर चलने लगती है। ये हवाएं तटीय क्षेत्र को आरामदायक बना देती है। व्यापक अर्थ में मानसून उस पवन को कहते हैं जो किसी क्षेत्र में किसी ऋतु विशेष में अधिकांश वर्षा कराती है। इस दृष्टि से संसार के अन्य क्षेत्र जैसे - उत्तरी अमेरिका , दक्षिणी अमेरिका , सब - सहारा अफ्रीका, आॅस्ट्रेलिया और पूर्वी एशिया को भी मानसून क्षेत्र की श्रेणी में रखा जा सकता है।



भारत में मानसून 


भारतीय संदर्भ में मानसून एक मौसमी पवन है, जो दक्षिणी एशिया में लगभग चार माह (जून से सितम्बर) तक सक्रिय रहती है। ये हिन्द महासागर और अरब सागर की तरफ से भारत के दक्षिण पश्चिमी तट पर आने वाली हवाएं हैं जो भारत, पाकिस्तान , बांग्लादेश आदि में भारी वर्षा कराती है। आर्द्रता से लदी इन पवनों के साथ ही बादलों का प्रचंड गर्जन और बिजली का चमकना शुरू हो जाता है। इसे मानसून ‘फटना‘ या ‘टूटना‘ कहा जाता है। भारतीय मौसम विभाग की परिभाषा के अनुसार वर्षा का दिन वह होता है जब किसी स्थान विशेष पर इसकी मात्रा 24 घंटे में 2.5 सेमी से ऊपर हो। भारतीय अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक प्रभाव मानसून डालता है। यहां की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है और यहां के कुल फसल क्षेत्र का 4/5 भाग सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर है। दक्षिण भारत की अनेक नदियां , जो अनेक आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र है, वर्षा से ही जल प्राप्त करती है। मानसून के शीघ्र या देर से आने से  यहां की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। वार्षिक वर्षा का अधिकांश भाग दक्षिण - पश्चिमी मानसून से ग्रीष्म ऋतु में प्राप्त होता है। इसके अलावा शीतकाल में शीतोष्ण चक्रवातों द्वारा गंगा के मैदानों में व ग्रीष्मकाल में उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों द्वारा तटीय क्षेत्रों में वर्षा होती है।




दक्षिण - पश्चिमी मानसून

भारत में ज्यादातर बरसात इसी मानसून की वजह से होती है। यहां गर्मी की ऋतु के बाद वर्षा ऋतु का आगमन दक्षिण - पश्चिमी मानसून के साथ होता है। तकरीबन पूरे भारत में जून, जुलाई, अगस्त  और सितम्बर के महीनों में अधिकतर बरसात होती है और इस अवधि की लगभग 75 - 80 फीसदी बरसात इन्ही पवनों की वजह से होती है। गर्मियों में उत्तर - पश्चिमी मैदानी भागों   में तापमान बढ़ने की वजह से वायुदाब कम हो जाता है। जून की जबरदस्त गर्मी की वजह से यहां का वायुदाब इतना कम हो जाता है कि दक्षिणी गोलार्द्ध की दक्षिणी - पूर्वी सन्मार्गी हवाएं भूमध्य रेखा को पार कर भारत के निम्न वायुदाब की ओर चली आती है। दक्षिणी गोलार्द्ध की दक्षिण - पूर्वी पवनें समुद्र में पैदा होती है। हिन्द महासागर में विषुवत वृत्त को पार कर ये पवनें बंगाल की खाड़ी व अरब सागर में आ जाती है और यहां आने के बाद भारत के वायु संचरण का अंग बन जाती है। विषुवतीय गर्म धाराओं के ऊपर से गुजरने की वजह से ये बड़ी मात्रा में आर्द्रता ग्रहण कर लेती है और विषुवत वृत्त पार करते ही दक्षिण - पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। यही वजह है कि इन्हें दक्षिण पश्चिमी मानसून पवनें ले लेती है। इन पवनों की औसत गति 30 किमी प्रतिघन्टा होती है। उत्तर - पश्चिमी भागों को छोड़कर ये तकरीबन एक महीने में पूरे भारत में फैल जाती है।


अरब सागर का मानसून 

विषुवत रेखा के दक्षिण से आने वाली स्थायी पवनें मानसून के रूप में अरब सागर की ओर आगे बढ़कर सबसे पहले पश्चिमी घाट के पहाड़ से टकराती है। इस कारण सहयाद्रि या पश्चिमी घाट के पवनाभिमुख ढालों पर भारी बरसात होती हैं। पश्चिमी घाट के पर्वत को पार करते समय इनकी आर्द्रता कम हो जाती है। यही वजह है कि दक्कन के पठार और मध्यप्रदेश में कम वर्षा होती है। यह क्षेत्र वृष्टिछाया के दायरे में आ जाता है। इस मानसून की शाखा का दूसरा भाग सौराष्ट्र के प्रायद्वीप और कच्छ से हो कर पश्चिमी राजस्थान और अरावली की श्रेणियों के ऊपर से गुजरती है। यहां इनसे बहुत कम बरसात होती है। इसके बाद पंजाब और हरियाणा में पहंुचकर यह शाखा बंगाल की खाड़ी के मानसून में मिल जाती है। आपस में एक - दूसरे से शक्ति पाकर ये दोनों शाखाएं हिमालय के पश्चिमी भागों में वर्षा करती है।




बंगाल की खाड़ी का मानसून 


दक्षिण - पश्चिमी मानसून की यह शाखा भूमध्य रेखा को पार कर भारत में पूरब की ओर से दाखिल होती है। यह शाखा म्यांमार के तट की ओर व बांग्लादेश के दक्षिण - पूर्वी  भागों के तट की ओर बढ़ती है, लेकिन म्यांमार के तट पर फैली अराकन पहाड़ियां इस शाखा के एक बड़े भाग को भारतीय उपमहाद्वीप की दिशा में मोड़ देती है। यही वजह है कि पं. बंगाल व बांग्लादेश में ये पवनें दक्षिण दिशा की बजाय दक्षिण व दक्षिण - पूर्वी दिशाओं से आती है। इसके बाद विशाल हिमालय व उत्तर - पश्चिमी भारत के कम वायुदाब की वजह से यह शाखा दो भागों में बंट जाती है। एक पश्चिमी की ओर बढ़कर गंगाा के मैदान तक पहुंचती है और दूसरी शाखा उत्तर व उत्तर - पूरब में ब्रह्मपुत्र घाटी की ओर जाती है।  इस वजह से उत्तर - पूर्वी भारत में भारी बरसात होती है।  इसकी एक छोटी शाखा मेघालय में गारों और खासी की पहाड़ियों से टकराती है। इन पहाड़ियों के दक्षिणी भाग में चेरापूंजी स्थित है। चेरापूंजी और मासिनराम विश्व में सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान है और इसकी वजह इसकी आकृति वाली घाटी के शीर्ष पर स्थिति होना तथा स्थलाकृति की दृष्टि से अनोखी स्थिति होना है। 



बुधवार, 9 सितंबर 2020

हम युवा हैं Ham yuva hai

हम युवा हैं हम करें मुश्किलों से सामना ।

मातृभूमि हित जगे है हमारी कामना ।।


संस्कृति पली यहाँ , पुण्य भू जो प्यारी है।

जननी वीरों की अनेक , भरत भू हमारी है।।

ऐसा अब युवक कहाँ , दिल जिसके राम ना।।1।।


ज्ञान के प्रकाश की , ले मशाल हाथ में।

शील की पवित्रता , है हमारे साथ में।।

एकता के सुर उठे, छूने को ये आसमां।।2।।



ये कदम हजारों अब, रूक न पायेंगे कभी। 

मंजिलों पे पहुँच कर ही विराम ले सभी ।।

ध्येय पूर्ति पूर्व अब , रूक न पाये साधना।। 3।।


शनिवार, 21 मार्च 2020

जिंदगी में सफलता के लिए चाणक्य महान के महान सूत्र

"दूसरो की गलतियों से सीखो अपने ही ऊपर प्रयोग करके सीखने को तुम्हारी आयु कम पड़ेगी." 2)"किसी भी व्यक्ति को बहुत ईमानदार (सीधा साधा ) नहीं होना चाहिए ---सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं." 3)"अगर कोई सर्प जहरीला नहीं है तब भी उसे जहरीला दिखना चाहिए वैसे डंस भले ही न दो पर डंस दे सकने की क्षमता का दूसरों को अहसास करवाते रहना चाहिए. "  4)"हर मित्रता के पीछे कोई स्वार्थ जरूर होता है --यह कडुआ सच है." 5)"कोई भी काम शुरू करने के पहले तीन सवाल अपने आपसे पूछो ---मैं ऐसा क्यों करने जा रहा हूँ ? इसका क्या परिणाम होगा ? क्या मैं सफल रहूँगा ? " 6)"भय को नजदीक न आने दो अगर यह नजदीक आये इस पर हमला करदो यानी भय से भागो मत इसका सामना करो ." 7)"दुनिया की सबसे बड़ी ताकत पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता है." 8.) "काम का निष्पादन करो , परिणाम से मत डरो." 9)"सुगंध का प्रसार हवा के रुख का मोहताज़ होता है पर अच्छाई सभी दिशाओं में फैलती है." 10)"ईश्वर चित्र में नहीं चरित्र में बसता है अपनी आत्मा को मंदिर बनाओ." 11) "व्यक्ति अपने आचरण से महान होता है जन्म से नहीं." 12) "ऐसे व्यक्ति जो आपके स्तर से ऊपर या नीचे के हैं उन्हें दोस्त न बनाओ,वह तुम्हारे कष्ट का कारण बनेगे. सामान स्तर के मित्र ही सुखदाई होते हैं ." 13) "अपने बच्चों को पहले पांच साल तक खूब प्यार करो. छः साल से पंद्रह साल तक कठोर अनुशासन और संस्कार दो .सोलह साल से उनके साथ मित्रवत व्यवहार करो.आपकी संतति ही आपकी सबसे अच्छी मित्र है." 14) "अज्ञानी के लिए किताबें और अंधे के लिए दर्पण एक सामान उपयोगी है ." 15) "शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है. शिक्षित व्यक्ति सदैव सम्मान पाता है. शिक्षा की शक्ति के आगे युवा शक्ति और सौंदर्य दोनों ही कमजो

जन्मदिन कैसे मनाया जाए How To Celebrated The Birthday

आपको बदलनी अपनी किस्मत तो ऐसे मनाएं अपना जन्मदिन

जिस दिन हम पैदा हुए उस घर परिवार में हर तरफ खुशी का माहौल और मां पिता जी के लिए एक नया एहसास और खुशी जिसे शायद बयां करने के शब्द भी उनके पास ना हो. वही हो जाता है हमारा जन्मदिन उस दिन को जन्मदिन के रूप हर साल आनन्द करते है। लेकिन आज कल युवा उस दिन अपने मां पिता का आर्षीवाद लेने के बजाय माॅडर्न दिखने के चक्कर में ढ़ोग करते फिरते है , लेकिन इस सब के पीछे माता पिता भी जिम्मेदार हैं क्यूँकि वह अपने बच्चे बालपन से ही उस अपने संस्कारों की बजाय अंग्रेजियत लाद देते है.

इस धरती पर अवतरण के उस दिन को जन्मदिन के रूप में मनाते है और जन्मदिन की उस खुशी में हम पाश्चात्य सभ्यता के चकाचैंध में खो जाते है

जिस दिन मेरा जन्मदिन होता था मां सुबह ही पैर छूकर बड़ो का आशीर्वाद लेने को कहती , वैसे तो मेरे परिवार सभी जल्दी जागना, अपने से बड़ो को प्रणाम करना यह सभी कार्य एक नियमितता से होते है , लेकिन जिस दिन मेरा जन्मदिन होता था  वो दिन कुछ खास हो जाता है। 
सुबह जगकर बड़ो का आशीर्वाद लेने के बाद नित्य क्रिया स्नानादि से निवृत होकर मां पिता के साथ मन्दिर जाकर पूजा अर्चना करता उसके बाद कुछ दान करना और  फिर मां और दादी ,बहन , बुआ आदि मेरा तिलक करती और घर में दीप जलाकर उस सर्वशक्तिशाली ईश्वर का धन्यवाद और मेरे उज्जवल भविष्य की कामना करते थे। यह एक बहुत सुन्दर एहसास होता था।
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हमारी इस पद्धति को बहुत से लोग पिछड़ापन के कहते लेकिन हमें क्या फर्क पडना था। जन्मदिन के दिन दान देने के संस्कार ने मेरे अन्दर असहायांे की मदद की जो भावना उत्पन्न की वो मुझे हमेशा सुकून देती है। 
लेकिन आजकल के माहौल जन्मदिन की पार्टी के नाम पर हजारों रूपये उड़ा देते , नयेपन के नाम पर शराब , सिगरेट जैसे अन्य नशों का सेवन करते है। और फिर चरित्र का पतन करते है । और फिर कहते है हम  तो विकसित हो गये।

एक बार की एक घटना जो मेरे सामने घटी की एक लडकी को 4 लड़के जबरदस्ती गाड़ी में बिठा रहे थे तो इस घटना को देखने वालों कुछ लोगो ने पुलिस को सूचना करदी जब पुलिस उस स्थान पर पहुंची और उन लोगो को गिरफ्तार करने लगी तो उनमें एक लड़के बताया कि यह हमारी दोस्त है और मेरे जन्मदिन की पार्टी थी और इसने उस चक्कर में शराब ज्यादा पी ली और अब गाड़ी में बैठने से मना कर रही थी तो हम इस बिठा रहे थे, पुलिस उन सभी के मां पिता जी को सूचना कर बुलवाया।
  लेकिन सोचिए ? ये कैसा जन्मदिन की खुशी मनाना है जब मां बाप थाने में अपने बच्चों को देखा होगा तो क्या सोचा होगा , कितनी शर्मिन्दगी उठायी होगी । लेकिन आज युवा पीढ़ी विकास के पथ पर चलने की अपेक्षा विनास के राह अपना रही है।

इसलिए मैं यह सोचता हूँ कि अपने जन्मदिन पर हमें अपनी भारतीय पद्धति से जन्मदिन मनाना चाहिए ।
हम सभी को अपना जन्मदिन मनाने का बड़ा शौक होता है और उनमें उस दिन बड़ा उत्साह होता है लेकिन अपनी परतंत्र मानसिकता के कारण हम उस दिन भी अपने और अपने बच्चे के दिमाग पर अंग्रेजियत की छाप छोड़कर अपने साथ, उसके साथ व देश तथा संस्कृति के साथ बड़ा अन्याय कर रहे है।
जन्मदिन पर हम ‘ केक ’ बनवाते है तथा जन्म को जितने वर्ष हुए हों उतनी मोमबत्तियाँ ‘केक’ पर लगवाते है। उनको जलाकर फिर फूँक मारकर बुझा देते हैं।

जरा विचार तो कीजिये कि हम कैसी उल्टी गंगा बहा रहे है ! जहाँ दीये जलने चाहिए वहाँ बुझा रहे हैं! जहाँ शुद्ध चीज खानी चाहिए वहाँ फँूक मारकर उड़े हुए थूक से जूठे हुए ‘केक’ को हम बड़े चाव से खाते हैं! जहाँ हमें गरीबी को अन्न खिलाना चाहिए वहीं हम बड़ी पार्टियों का आयोजन कर व्यर्थ पैसा उड़ा रहे हैं! 
कैसा विचित्र है आज का हमारा समाज ?

हमें चाहिए कि हम बच्चों को उनके जन्मदिन पर भारतीय संस्कार व पद्धति के अनुसार ही कार्य करना सिखायें ताकि इन मासूमों को हम अंग्रेज न बनाकर सम्माननीय भारतीय नागरिक बनायें।
आपको बदलनी अपनी किस्मत तो ऐसे मनाएं अपना जन्मदिन

मान लो, किसी बच्चों का 11वाँ जन्मदिन है तो थोड़े से अक्षत (चावल) लेकर उन्हें हल्दी, कुमकुम , गुलाल , सिंदूर आदि मांगलिक द्रव्यों से रंग लें और उनसे स्वास्तिक बना लें । उस स्वास्तिक पर 11 छोटे छोटे दीये रख दें और 12 वें वर्ष की शुरूआत के प्रतीकरूप एक बड़ा दीया रख दें। फिर घर के बड़े सदस्यों से सब दीये जलवायें तथा बच्चा बड़ों को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद ग्रहण करे।


  • पार्टियों में फालतू का खर्च करने के बजाय अपने और  बच्चों के हाथों से गरीबों में , अनाथालयों में भोजन , वस्त्र इत्यादि का वितरण करवाकर अपने धन को सत्कर्म में लगाने के सुसंस्कार दृढ़ करें।



  • लोगों के पास से चीज वस्तुएँ लेने के बजाय हम अपने बच्चों को दान करना सिखायें ताकि उनमें लेने की वृत्ति नहीं अपितु देने की वृत्ति को बल मिले।



  • हमें उस दिन नये कार्य करवाकर उनमें देशहित की भावना का संचार करना चाहिए । जैसे - पेड़ - पौधे लगाना इत्यादि।



  • हमको इस दिन अपने गत वर्ष का हिसाब करना चाहिए यानी कि हमंने वर्षभर में क्या क्या अच्छे काम किये? क्या-क्या बुरे काम किये? जो अच्छे कार्य किये उन्हें भगवान के चरणों में अर्पण करना चाहिए और जो बुरे कार्य हुए उनको भूलकर आगे उन्हें न दोहराने व सन्मार्ग पर चलने का संकल्प करना चाहिए। 



  • अपने बच्चों से संकल्प करवाना चाहिए कि वे नये वर्ष में पढ़ाई, साधना , सत्कर्म , सच्चाई तथा ईमानदारी में आगे बढ़कर अपने माता-पिता व देश के गौरव को बढ़ायेंगे।


उपरोक्त सिद्धांतो के अनुसार अगर हम कदाचित् उन्हें भौतिक रूप से भले ही कुछ न दे पायें लेकिन इन संस्कारों से ही हम उन्हें भौतिक रूप से भले ही ऐसे महकते फूल बना सकते हैं कि अपनी सुवास से वे केवल अपना घर , पड़ोस , शहर , राज्य व देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को सुवासित कर सकेंगे।
उम्मीद करता हूँ कि आपको यह लेख अवश्य पसंद आया होगा
और आपसे एक विनती भी करता हूँ कि खुद माॅडर्न दिखाने के चक्कर खुद को बर्बाद मत करें। जिस भारतीय सभ्यता को विदेशी अपना रहे है हम उन्हीं से दूर जा रहे है।

अपनी संस्कृति अपनी पहचान 

कितनी सुन्दर है अपनी भारतीय संस्कृति उस पर गर्व करें।

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